कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ २६१ समय हिमवान् की पुत्री ने क्रम से से पर्णों को भी छोड़ दिया । बिना आहार के व्रत वाली होकर वह तपश्चरण से क्षीण हो गई क्योंकि हिमवान् की पुत्री ने आहार में पर्णों का भी त्याग कर दिया था । इसी से देवों ने पृथ्वी तल में उसको अपर्णा कहा था । पाँच अग्नियों के ताप व्रत से और जल में प्रवेशों के द्वारा उसने तप किया था । वह हिमाचल की पुत्री बसन्त में एक ही पाद से स्थित हुई थी । छःअक्षरों वाले मन्त्र का जप करती हुई उसने चिरकाल महान् तप का समाचरण किया था । वह चीरों और वल्कलों से शरीर को ढांपने वाली थी । वह जटा-जूटों के समूह रखने वाली थीं उसके सब अंग कृश हो गये थे परन्तु वह चिन्तन करने में शक्त थी । उसने ऐसा तप किया था कि मुनियों को भी जीत लिया । उस तपस्या के समाचरण में उसकी रक्षा स्वयं भगवान् शम्भु ने की थी । वे भगवान् शम्भु उसको सदा ही आप्यायित करते थे और हर्षित होकर उसकी भय से भी रक्षा किया करते थे । इस प्रकार से काली को तपोवन में तीन सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये । तब वह स्वयं वीक्षण से संस्कृत हो गई थी और दैव के द्वारा वह देवी हर के योग्य हो गई थीं । तिरेसठ सहस्र वर्षों के अन्त में जहाँ पर भगवान शम्भु ने तपस्या की थी, वहाँ पर क्षण भर स्थित होकर भामिनी ने चिन्तन किया था । महादेव क्या इस समय नियमों में संस्थित मुझको नहीं जानते हैं कि कारण से बहुत अधिक काल पर्यन्त तप में रत हुई का मुझे अनुज्ञान नहीं किया है । क्या मुनियों के द्वारा स्तवन किये गये गिरीश लोक में यहाँ पर नहीं हैं । देवी के द्वारा तो हर सब कुछ के ज्ञान रखने वाले, सर्वस्त्र गमन करने वाले देव कहे जाया करते हैं । वह सर्वत्रगामी, सर्वज्ञाता, सबकी आत्मा, सबके हृदय में रहने वाले, सबके विभूति प्रदाता और सर्व भावनों के भी भगवान देव हैं । मैं सती और मेरी माता मेनका है । यदि मैं वृषभध्वज में अनुराग से युक्त हूँ और अन्य में मेरा अनुराग नहीं है तो वह शंकर मुझ पर प्रसन्न हो जावें । यदि नारद के मुख से निकला हुआ छः अक्षरों वाला मन्त्र भक्तिभाव से मैंने जप