कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] २६२ ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ
किया है तो इससे हरि मुझ पर प्रसन्न हो जावें । यदि वास्तव में मैंने सत्य किया है सत्यतापूर्वक मैंने हरि की आराधना की है, यदि तप सत्य है तो इससे भगवान हर मुझ पर प्रसन्न हो जावें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह काली इस प्रकार से विशेष चिन्तन करती हुई जब भगवान् के आश्रम में संस्थित हुई थीं जिसका मुख नीचे की ओर था, दीन वेश था और वह जटा तथा वल्कलों से मण्डित थे । उस समय में कृष्ण मृग की छाला के उत्तरीय से शोभित, कमण्डलु और दण्ड धारण किए हुए, ब्रह्माजी श्री ये देदीप्यमान और परम शोभित ब्रह्मचारी परिवीत जटाओं से उद्रिक तनु को धारण करनेवाला था। ब्राह्मण के स्वरूप को धारण करने वाले शम्भु उसी समय द्विज ने उससे सम्भाषण किया था। उस समय प्रत्यक्ष रूप से अनुराग का ज्ञान प्राप्त करने के लिए और उसके मुख से वचन का श्रवण करने के लिए इच्छा करते हुए उस वाग्मी ने विचित्र वाक्य के द्वारा गिरिजा से पूछा था । ब्राह्मण ने कहा- हे कल्याणी! आप कौन है और किसकी पुत्री हैं ? इस विजन वन में किस लिए प्रत्यतात्मा मुनियों के साथ वह दुर्धर्ष तप कर रही हैं ? आप न तो बाला हैं और न वृद्धा ही है। आप तो अत्यन्त शोभन तरुणी हैं, बिना पति के निरन्तर क्यों यह इस समय में तपस्या कर रही हैं ? हे भद्रे! अथवा क्या आप किसी तपस्वी की पत्नी हैं वह तपस्वी पुष्पादि का समाहरण करने के लिए यहाँ से अन्य स्थल में चले गये हैं ? यदि आपको कोई गोपनीयता न हो तो यह मुझे आप सब बतलाइए । मैं उसको हटाने के लिए समर्थ हूँ। उस विप्र के द्वारा इस रीति से कही हुई गिरिजा ने अपनी सखी को उसको उत्तर देने के लिए कटाक्ष के द्वारा नियोजित कर दिया था। विजया सखी, उस समय उसके वचन से गिरिजा के मुख को देखती हुई यथातथ्य से बोली । हे द्विजोत्तम! यह इसी गिरिजा की पुत्री है और यह पार्वती-नाम से प्रख्यात है और काली के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह किसी भी द्वारा कही नहीं गयी है। वह वृषभध्वज शंकर को अपना दयित पति चाहती