कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
२६० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ क्योंकि मेनका के द्वारा तपस्या के लिए वन में जाना निरस्त कर दिया था अर्थात् निषेध कर दिया गया था उस समय में सती उमा ने सोमा-यह नाम प्राप्त कर लिया था। उस अवसर पर हिमाचल की पुत्री ने माता की अवज्ञा करके सखियों के द्वारा तप करने का उद्यम पिता के ज्ञापित किया था। उस गिरियों के स्वामी ने तप के लिए समाचरित उद्यम का ज्ञान प्राप्त करके अत्यन्त प्रसन्न मन वाला न होते हुए ही अपनी पुत्री को अनुमति दे दी थी। उसी समय सती ने पिता को अनुज्ञापित करके जहाँ पर कामदेव शम्भु के द्वारा दग्ध किया था उसी गंगावतरण की ओर वह चली गयी। गंगावतरण को काली ने भगवान् हर के रहित ही देखा था। उस समय में उसकी चिन्तो से संयुत हो गई थी। पहले जहाँ स्थित होकर शम्भु बहुत ध्यान वाले हुए थे। वह काली वहाँ पर स्थित होकर विरह से पीड़ित हो रही थी। गिरि की पुत्री वहाँ पर 'हाहा' कहती हुई चिन्ता और शोक से समन्वित तथा अत्यन्त दुःख से पीड़ित हो विलाप करने लगी थी। क्षण भर तक काली ने विलाप किया था फिर उसी समय में उसको पूर्व उद्भव का स्मरण हो गया था। कमलों के समान नेत्रों वाली उमा ने हर के हार्द को और मोह को प्राप्त किया था। इसके पश्चात् चिरकाल उस भामिनी ने धीरता से मोह का संस्तम्भन किया था और वहीं पर नियम के लिए वह रुक गई थीं और हिमवान् की सुता नियम के लिए दीक्षित हो गई थी। उसका प्रथम नियम फलों का ही भोजन करके रहना था। पञ्च अग्नियों की तपस्या ही उसकी चर्या थी, शाम्भवी अर्थात् शम्भु से सम्बन्ध रखने वाली चिन्ता थी तथो सम्बन्धित जप था। यज्ञिय अर्थात् यज्ञ में काम आने वाले सूखे काष्ठों से चारों वह्नियों की स्थापना करके जो वैश्वानर की दृष्टि के द्वारा की गई थी। उनके मध्य में स्थित होती हुई वल्कलों के वस्त्रों वाली सूर्य के बिम्ब का वीक्षण करती थी। ग्रीष्म ऋतु को अग्नि के मध्य में और शिशिर में वह जल से वास करने वाली हुई थी। प्रथम समय फलों के द्वारा और द्वितीय समय केवल जल से व्यतीत किया था। तीसरा
६०८ श्रीकालिका पुराण ६०८ २६१ समय हिमवान् की पुत्री ने क्रम से से पर्णों को भी छोड़ दिया । बिना आहार के व्रत वाली होकर वह तपश्चरण से क्षीण हो गई क्योंकि हिमवान् की पुत्री ने आहार में पर्णों का भी त्याग कर दिया था । इसी से देवों ने पृथ्वी तल में उसको अपर्णा कहा था । पाँच अग्नियों के ताप व्रत से और जल में प्रवेशों के द्वारा उसने तप किया था । वह हिमाचल की पुत्री बसन्त में एक ही पाद से स्थित हुई थी । छःअक्षरों वाले मन्त्र का जप करती हुई उसने चिरकाल महान् तप का समाचरण किया था । वह चीरों और वल्कलों से शरीर को ढांपने वाली थी । वह जटा-जूटों के समूह रखने वाली थीं उसके सब अंग कृश हो गये थे परन्तु वह चिन्तन करने में शक्त थी । उसने ऐसा तप किया था कि मुनियों को भी जीत लिया । उस तपस्या के समाचरण में उसकी रक्षा स्वयं भगवान् शम्भु ने की थी । वे भगवान् शम्भु उसको सदा ही आप्यायित करते थे और हर्षित होकर उसकी भय से भी रक्षा किया करते थे । इस प्रकार से काली को तपोवन में तीन सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये । तब वह स्वयं वीक्षण से संस्कृत हो गई थी और दैव के द्वारा वह देवी हर के योग्य हो गई थीं । तिरेसठ सहस्र वर्षों के अन्त में जहाँ पर भगवान शम्भु ने तपस्या की थी, वहाँ पर क्षण भर स्थित होकर भामिनी ने चिन्तन किया था । महादेव क्या इस समय नियमों में संस्थित मुझको नहीं जानते हैं कि कारण से बहुत अधिक काल पर्यन्त तप में रत हुई का मुझे अनुज्ञान नहीं किया है । क्या मुनियों के द्वारा स्तवन किये गये गिरीश लोक में यहाँ पर नहीं हैं । देवी के द्वारा तो हर सब कुछ के ज्ञान रखने वाले, सर्वस्त्र गमन करने वाले देव कहे जाया करते हैं । वह सर्वत्रगामी, सर्वज्ञाता, सबकी आत्मा, सबके हृदय में रहने वाले, सबके विभूति प्रदाता और सर्व भावनों के भी भगवान देव हैं । मैं सती और मेरी माता मेनका है । यदि मैं वृषभध्वज में अनुराग से युक्त हूँ और अन्य में मेरा अनुराग नहीं है तो वह शंकर मुझ पर प्रसन्न हो जावें । यदि नारद के मुख से निकला हुआ छः अक्षरों वाला मन्त्र भक्तिभाव से मैंने जप
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किया है तो इससे हरि मुझ पर प्रसन्न हो जावें । यदि वास्तव में मैंने सत्य किया है सत्यतापूर्वक मैंने हरि की आराधना की है, यदि तप सत्य है तो इससे भगवान हर मुझ पर प्रसन्न हो जावें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- वह काली इस प्रकार से विशेष चिन्तन करती हुई जब भगवान् के आश्रम में संस्थित हुई थीं जिसका मुख नीचे की ओर था, दीन वेश था और वह जटा तथा वल्कलों से मण्डित थे । उस समय में कृष्ण मृग की छाला के उत्तरीय से शोभित, कमण्डलु और दण्ड धारण किए हुए, ब्रह्माजी श्री ये देदीप्यमान और परम शोभित ब्रह्मचारी परिवीत जटाओं से उद्रिक तनु को धारण करनेवाला था। ब्राह्मण के स्वरूप को धारण करने वाले शम्भु उसी समय द्विज ने उससे सम्भाषण किया था। उस समय प्रत्यक्ष रूप से अनुराग का ज्ञान प्राप्त करने के लिए और उसके मुख से वचन का श्रवण करने के लिए इच्छा करते हुए उस वाग्मी ने विचित्र वाक्य के द्वारा गिरिजा से पूछा था । ब्राह्मण ने कहा- हे कल्याणी! आप कौन है और किसकी पुत्री हैं ? इस विजन वन में किस लिए प्रत्यतात्मा मुनियों के साथ वह दुर्धर्ष तप कर रही हैं ? आप न तो बाला हैं और न वृद्धा ही है। आप तो अत्यन्त शोभन तरुणी हैं, बिना पति के निरन्तर क्यों यह इस समय में तपस्या कर रही हैं ? हे भद्रे! अथवा क्या आप किसी तपस्वी की पत्नी हैं वह तपस्वी पुष्पादि का समाहरण करने के लिए यहाँ से अन्य स्थल में चले गये हैं ? यदि आपको कोई गोपनीयता न हो तो यह मुझे आप सब बतलाइए । मैं उसको हटाने के लिए समर्थ हूँ। उस विप्र के द्वारा इस रीति से कही हुई गिरिजा ने अपनी सखी को उसको उत्तर देने के लिए कटाक्ष के द्वारा नियोजित कर दिया था। विजया सखी, उस समय उसके वचन से गिरिजा के मुख को देखती हुई यथातथ्य से बोली । हे द्विजोत्तम! यह इसी गिरिजा की पुत्री है और यह पार्वती-नाम से प्रख्यात है और काली के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह किसी भी द्वारा कही नहीं गयी है। वह वृषभध्वज शंकर को अपना दयित पति चाहती
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६३ ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ-ॐ हुई तीव्र तप का समाचरण कर रही है । तीन सहस्त्र वर्ष हुए यह भामिनी तपस्या कर रही हैं किन्तु भगवान् शंकर इस गिरिजा की पुत्री को प्राप्त नहीं हो रहे हैं । भगवान् शंकर सर्वत्र गमन करने वाले परमेश्वर देवों, मुनिगणों और तपस्वियों के द्वारा कहे जाया करते हैं । क्या वे इसको नहीं जानते हैं । क्या वे पर्वत के शिखर पर विराजमान नहीं है ? यह आज इसी चिन्ता में दुःखित हैं और इसको सुख प्राप्त नहीं हो रहा है । हे सुव्रत! आप भगवान् शंकर से इसका संगम कर दीजिए । उस द्विज ब्रह्मचारी ने उस समय उसके इस वचन का श्रवण करके मुस्कराते हुए उस पार्वती को यह वचन बोला था । ब्राह्मण ने कहा-मैं अमोघ दर्शन वाला हूँ और मैं भगवान् हर को लाने के लिए भी समर्थ हूँ । किन्तु मैं आज एक बात कहता हूँ-मेरे निश्चित मत का श्रवण करिए । मैं महादेवजी का जानता हूँ, मैं उनको बोल भी दूँगा किन्तु मुझ से सुन लो, वृषभध्वज महादेव विभूति के वेष वाले हैं और जटाधारी हैं । वे बाघम्बर के वस्त्र धारण करने वाले, एकाकी और मृग के चर्म से ढके हुए रहते हैं । वे कपालों को धारण करते हैं तथा सर्पों के समुदायों से वेष्टित रहा करते हैं । उन शम्भु का गला विष से दग्ध हो रहा है उनके तीन नेत्र हैं-वे विरूपाक्ष हैं और विभीक्षण हैं अर्थात् विशेष रूप से भयंकर हैं । उनका जन्म भी अव्यक्त है अर्थात् उनके जन्म से विषय में कुछ भी किसी को ज्ञान नहीं है वे निरन्तर गृहस्थाश्रम के भोग से रहित हैं । शंकर ज्ञानिजन तथा बन्धुजनों से हीन हैं और भक्ष्य भोज्य से भी वर्जित हैं । शम्भु निरन्तर श्मशान में निवास करने वाले हैं और संग से परिवर्जित रहा करते हैं । गर्जन करने वाले, विकृत स्वरूपधारी और तीक्ष्ण भूत गणों से सदा घिरे हुए रहा करते हैं । शंकर श्रृंगार रस से रहित हैं तथा उनके न कोई भार्या है और न पुत्रादि ही हैं । किस कारण से आप उनको अपना भर्त्ता बनाना चाहती हैं । मैंने पूर्व में होने वाला भी उनका एक दूसरा कृत्य सुना है । आप उसका श्रवण करिये मैं आज आपको
बतलाता हूँ। यदि आपको अच्छे लगे तो ग्रहण कीजिए। प्रजापति दक्ष की पुत्री सती परम साध्वी थी उसने पहले वृषभध्वज को अपना पति वरण किया था। यह भाग्य की ही बात थी वह पति सम्भोग से रहित थे। यह कपाली की जाया है इसी से वह सती दक्ष के द्वारा परिवर्जित कर दी गई थी। यज्ञ में भाग लेने के लिए शम्भु को भी वर्जित कर दिया गया था। उसी अपमान के होने से सती अत्यधिक शोक से आकुल हो गई थी। उस सती ने अपने परम प्रिय प्राणों का परित्याग कर दिया था, भगवान् शंकर भी त्याग कर दिए गये थे। आप तो स्त्रियों में रत्न के ही समान अत्युत्तम हैं। अपका पिता हिमवान् सभी पर्वतों का राजा है। फिर किस कारण से उस प्रकार के पति के प्राप्त करने की इस उम्र में तप के द्वारा इच्छा कर रही हैं? देवों का स्वामी, धनेश, पवन, वरुण, अग्नि अथवा कोई अन्य देव अथवा सब वैद्य अश्विनीकुमार, विद्याधर, गन्धर्व, नाग अथवा मानुष जो भी रूप और यौवन से सुसम्पन्न आपका पति होने योग्य है। जिसके द्वारा आप बहुत रत्नों के समूह से पूरित बहुमूल्य माल्य प्रवरों से संयुत धूप के चूर्णों से सुवासित, कोमल आस्तारण से समन्वित, सुमनोहर, सुविस्मृत, सुरम्य प्रासाद के मध्य में स्थित सुवर्ण के द्वारा विशेष रूप से चित्रित शय्या के बल में समासादन करके संस्थित रहने वाला ही आपका योग्य पति होगा। हे सुभगे! इस भाँति ज्ञान प्राप्त करके भी यदि आप शंकर को ही अपना बनाना चाहती है तो फिर आपको इन तपस्याओं से क्या प्रयोजन है मैं अपने आप ही उनके साथ योजित किये देता हूँ। यह सुनकर काली क्रोधित हुई। इस ब्राह्मण को उसने उत्तर के रूप में बहुत ही अल्प और तथ्य कहा था। काली ने कहा-तुम देवेश्वर हर को नहीं जानते ही बल्कि व्यर्थ ही आपने कह डाला है। जिन प्रभु के भाव को इन्द्रादि और ब्रह्मा प्रभृति सुर भी नहीं जानते हैं। उनके भाव को तुम शिशु होते हुए, हे विप्रसुत! क्या जान सकोगे। आपने जो भी नीचों के मुख से भाषित सुना है वह बहुत तुच्छ हैं।
ᏋᏊ श्रीकालिका पुराण ᏋᏊ २६५ आप इधर-उधर से सुनकर ही ऐसा भाषण कर रहे हैं। आपने उनका कभी भी दर्शन नहीं किया है। इस कारण से मैं आपसे वरदान नहीं चाहती हूँ और न पति के विषय में जानना चाहती हूँ। गिरिजा ने उन विप्र को इतना ही कहकर अपनी सखी का मुख देखकर उस अवसर पर संशय में समारूढ़ होकर यह कहा था। इसलिए मैं इस समय स्तुति वाक्य के द्वारा उसका प्रायश्चित् करूँगी। जो भी कोई महान् आत्मा वालों की निन्दा का श्रवण करता है अथवा बुराई किया करता है उन दोनों का अपराध समान ही होता है, ऐसा मैंने अपने पिताजी के मुख से पूर्व में श्रवण किया है। इसी कारण से में इसको दूर करूँगी सो विप्र को निषेध कर दो अर्थात् रोक दो। उस काली ने यह सखी से कहकर अपराध के सम्मार्जन करने के लिए भगवान् शम्भु का स्तवन करना आरम्भ कर दिया। काली ने कहा-शान्त और कारणत्रय के हेतु अर्थात् सृष्टि स्थित और संहार इन तीनों के कारण स्वरूप शिव के लिए नमस्कार है। हे परमेश्वर! मैं अपने आपको निवेदन करती हूँ और आप ही मेरी गति हैं। विज्ञान, सौभाग्य और सुहृत में गत, प्रपञ्च से रहित हिरण्यबाहु, नारायण के नाभि पद्म से समुत्पन्न प्रधान बीज, जगत् के हितरूप आपके लिए नमस्कार। इस भाँति स्तवन करती हुई उसको यह द्विज पुनः उस समय कुछ कथन करने के लिए उद्यत होने वाला है यह समीक्षण करके काली को यत्न कर दिया था और गिरिराज की पुत्री ने समझ करके सखी से कहा था। यह द्विज कुछ कहना चाहता है और उग्र हर को नहीं जानता। अतएव यह उनकी निन्दा कर रहा है। किन्तु मैं प्राणों के हरण करने वाली शिव की निन्दा सुनने में समर्थ नहीं हूँ। हे सखी! इस समय जब तक इसके वचनों का श्रवण नहीं करूँ तब तक मैं दूर देश को गमन करती हूँ। हे मत्प्रिये! वहाँ पर दूर देश में समुपस्थित रहूँ। इतना कहकर वह काली हिमवान् की पुत्री उसी सखी के सहित प्रस्थान कर गई थी और द्विज को हठात् छोड़कर
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उठकर चली गयी थी। इसके अनन्तर निज रूप प्रकट होकर शंकर ने रूदन करती हुई हिमवान् की सुता के पीछे गमन किया था। शिव ने कहा-मैं ही महादेव हूँ और हर हूँ! क्या अब आप मेरा स्तवन नहीं करती है। हे काली! हे शांकरि!! मेरे सम्मुख होकर मुझे समाश्वासित करो। इतना कहकर वे महादेव काली के आगे गमन कर उपस्थित हो गये थे। उन्होंने दोनों हाथों को फैलाकर उस काली की गति का अवरोध किया था। वह गिरिराज की बेटी शम्भु के मुख को देख कर उसी क्षण बरबस नीचे की ओर मुख वाली हो गई थी जिस तरह से वायु से चकित तडित हो जाया करती है। प्रीति की लज्जा से मन्द नेत्रों वाली होते हुए उस समय में वह जड़ की ही भाँति हो गयी थी वह भामिनी बोलने की इच्छा वाली होती हुई भी बोलने में समर्थ न हो सकी थी। हे द्विजोत्तमो! मनोरथों की सिद्धि को जानने से उनका शरीर सुधा से पूरित के समान हो गया था और आनन्द से परिपूर्ण हो रहा था। नौ सहस्र वर्ष तक उस काली ने तपश्चर्या का क्लेश प्राप्त किया था। किन्तु उसी क्षण में उस सम्पूर्ण क्लेश का त्याग करके वह आनन्द से हर्षित हो गई थी। उस प्रकार से अवस्थित उसको प्रणय वाली देखकर वृषभध्वज भस्मीभूत कामदेव के द्वारा जो कि गात्र में विद्यमान था, मोहित हो गये थे। इसके अनन्तर विरह से उद्रिक्त होकर वृषभध्वज साथ में आकर सम्बोधन करते हुए आनन्द से यह चाटु वचन कहने लगे थे। हे सुन्दरी! क्या मुझसे कुछ भी कहना नहीं चाहती हैं ? तप के क्लेश का स्मरण करती हुई क्या इस समय में मुझ पर कुपित हो रही हैं। हे सुभगे! तुम्हारे बिना मैं परितप्त हो रहा हूँ। मेरे समय से जो आपने तप श्रर्या करने का सामारम्भ किया था। हे प्रिये! मैं अनुराग से युक्त हूँ। मैं संस्कार करके तुम्हारे साथ होऊँगा। मैंने जो प्राण किया था, व्यतीत हो गया। आप भी तप के लिए समुद्यत हुई थीं और उस तप से ही आप भली भाँति संस्कृत हो गई हैं। आपने भली-भाँति चिन्तन किया, तीव्र
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६७ जप किया और सदा तप किया था । आपने यह सब करके बड़ी भारी कीमत के द्वारा मुझे खरीद लिया है । अब मैं आपका दास गया हूँ मुझे नियोजित कीजिए । आप अपने अंग-संस्कार करके जटाओं के प्रसाधन में मेरा नियोजन करें । शरीर से वल्कल को हटाकर सुन्दर वस्त्रों का निवेशन करने में, हार नूपूर और काञ्ची आदि के परिधान करने में, हे शुभे! शीघ्र ही नियोजित करिए । मैंने जो कामदेव को दग्ध कर दिया था वह भस्म रूप से मेरे शरीर में स्थित है । मेरा प्रतिकार करके ही मुझे तुम्हारे ही सामने दग्ध कर देना चाहता है । हे मनोवर! अपने अंग के अमृत के दान के द्वारा उस कामग्नि से मेरा उद्धार करिये । हे दरिते! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये । काली-हर समागम वर्णन मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- भगवान् शम्भु ने वचन का श्रवण कर गिरिजा अत्यन्त हर्षित हो गई थी और उसने उस समय में शम्भु को अपना प्राप्त हुआ पति मान लिया था । काली ने सखी के मुख से भगवान् शंकर से कहा था । जिस रीति से शम्भु सुनने की इच्छा करते हुए वाक्य का श्रवण कर रहे हैं। यहाँ पर सन्धि में अति भेद से सज्जक प्रवृत्त नहीं होते हैं । शंकर हर मर्यादा से मेरे उस पाणि का ग्रहण करें । कन्या पिता के द्वारा दत्त हुआ करती है तप से दत्त (दी हुई) नहीं होती है । इससे हिमवान् पिता की भली भाँति प्रार्थना करके भगवान् हर वैवाहिक विधि से ही मेरे पाणि का ग्रहण करें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके अन्तर काली लज्जा से समन्वित होती हुई विराम को प्राप्त हो गई थी । उस अवसर पर भगवान् शम्भु ने भी उसके वचन को सर्वथा सत्य और तथ्य एवं उचित ही ग्रहण किया था । इसके उपरान्त भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित ही वहाँ निवास करने लगे थे । जिस प्रकार से पहले रहते थे उसी भाँति इस समय भी उस गंगावतरण शिखर पर रहते थे । वह काली अपनी सखियों के साथ घिरी हुई अपने पिता के घर में चली गयी । वह सती दीन होती हुई
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गुरुजनों के मुख का अवलोकन नहीं कर रही हैं। इसी बीच सात ऋषियों का मरीचि जिनमें प्रधान थे उन मुनियों का चन्द्रशेखर प्रभु ने उस समय काली का प्रार्थना करने के लिए चिन्तन किया था। उसी क्षण में कामदेव के अरि शम्भु के द्वारा चिन्तन किये हुए मुनिगण किसी के द्वारा आकृष्ट हुए की ही भाँति उनके समीप में समागत हो गये थे। भगवान् शम्भु ने मुनियों को दीपित सात अग्नियों के ही समान देखा था और वसिष्ठ मुनि ने समीप में सती अरुन्धती को भी देखा था। शिव ने मुनियों द्वारा भी न वर्जित किया हुआ योषित् का ग्रहण करना धर्म मान लिया था। फिर उन समस्त मुनियों ने वृषभध्वज की पूजा करके स्मरण से समाकर्षित हुए प्रहर्ष से यह उन्होंने प्रिय बोला था। ऋषियों ने कहा-जो प्रत्यक्ष शुद्ध रूप दिखाई देता है वह चन्द्र से प्रसिद्ध और चन्द्र के खण्ड से उपशोभित है। अन्तर में प्रज्ञ मुनियों का वह भावित स्वरूप है। युक्तों के द्वारा भाग्य के उदय होने से भाग्य देखा गया है। प्रज्ञा के अधीन, ध्यान, तन्त्र, नित्य ध्यान करने के योग्य, नित्य और स्वप्रकाश है अर्थात् अपने ही से प्रकाश वाला है। वाह्य तत्त्व से निरन्तर पुञ्जीभूत और समुचित प्राप्त करने के योग्य भगवान् शम्भु का उदार धाम है। नेत्र के सहित जिसके अग्रभाग को देख कर ही सूर्य के समान दर्शन ही परित्राण के लिए होता है। यह स्थान शर्व का नित्यधाम है। स्तुति करने के योग्य शम्भु के उस देह को भक्ति से नमस्कार है। जो प्रथम आदि भाग से प्रकाश करता है, जो वाम भाग स्थित है वह यहाँ पर ही नेता हैं, भगवान् हर के ललाट में विशेष रूप से शक्ति धारण किये हुए वह हमारी अपनी सिद्धि के लिए प्रथम होवे। जो प्रधान के स्वरूप वाला सत्त्व, रज और तम से समन्वित हे वह पुरुष समस्त जगतों का हर हमारे ऊपर प्रसन्न होवे। इस प्रकार से मुनिगण ने विनय से अवनत होते हुए देवों की भली-भाँति स्तुति करके कहा कि आपने किस प्रयोजन के लिए हम लोगों का स्मरण किया है उसे आप बताइये। उस मुनियों के उस वचन का श्रवण करके भगवान् शंकर ने हास करते हुए उन मुनियों से सबको पृथक्-पृथक् सम्भाषण करके कहा था।
६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८३ २६९ ईश्वर ने कहा- समस्त जगतों की भलाई के लिए तथा अपने आपको सम्भोग करने के लिए एवं सन्तान की वृद्धि के हेतु मैं दाराओं के ग्रहण करने की इच्छा करता हूँ। इस समय में आप लोग मेरी सहायता कीजिए और मेरे लिए आप लोग तुहिनाचल से काली की याचना करिए। काली महान् तप के द्वारा शीघ्र ही मुझ को अपना पति प्राप्त करे, किन्तु मैं उसको विधिपूर्वक ही ग्रहण करूँगा। इस कारण से उस गिरिराज से याचना करें। जिस तरह से शैलराज स्वयं काली को प्रदान करने का उत्साह करें। वैसे-वैसे आप करिए क्योंकि आप लोग तो वाणी के वैभव से समन्वित हैं अर्थात् बोलने में बहुत ही कुशल हैं। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-मुनि गण ने भगवान् हर का सम्बोधन किया फिर गिरिराज के गृह को चले गये थे। गिरिराज ने उनका अभ्यर्थन किया था फिर मुनियों ने गिरिराज से कहा कि जो मस्तक में चन्द्र धारण करने वाले देव हैं और जो देवों के भी देव माने गये हैं। जो शाप देने तथा अनुग्रह करने में समर्थ हैं। जो एक ही जगतों के स्वामी हैं। जो समस्त जगतों का प्रलय काल आने पर संहार किया करते हैं, जो भक्त को विभूति (वैभव) के प्रदान करने वाले और अनेक स्वरूपों के धारण करने वाले परम सुन्दर हैं। वे ही शंकर आपकी पुत्री को अपनी भार्या के रूप में ग्रहण करने की इच्छा कर रहे हैं। यदि आप उनको अपनी पुत्री के समान सुयोग्य वर देखते हो तो हे गिरिवर ! उन शम्भु के लिए अपनी पुत्री को दे दो। उनके द्वारा इस भाँति कहे हुए अचलराज अपने हृदय में स्थित दुहिता के प्रिय की चिरकाल पर्यन्त समझकर और सद्वचन से आनन्द प्राप्त करके फिर प्रकाश में यह कहा- हे मुनियो! में शार्दूल के ही समान अर्थात् परमाधिक श्रेष्ठ आप लोगों ने पधारकर ही मुझे पवित्र कर दिया है और आपने मेरा भी अभिप्राय परिपूर्ण कर दिया। आप लोगों ने जब मुझे आदेश दिया है तो मैं अपनी पुत्री को भगवान् शम्भु के लिए अवश्य ही समर्पित कर दूँगा। इसने पूर्व तपस्या का समाचरण करके
२७० श्रीकालिका पुराण उसके द्वारा ईश्वर को अपना पति चाहा था। यह तो विधाता का ही नियोजन है। इसको अन्यथा करने में कौन समर्थ हो सकता है अर्थात् इसके विरुद्ध करने की शक्ति किसी में भी नहीं। बिना शम्भु के अन्य कौन है जो मेरी पुत्री की प्रार्थना करने में समर्थ हो। जिसको हर ने ग्रहण कर लिया है उसका ग्रहण करने का अन्य कौन उत्साह करेगा। और वह काली भी अपने मन से मन्त्र को ग्रहण कर अन्य किसी की इच्छा ही नहीं कर रही हैं। इतना कहकर मेनका के साथ शम्भु के लिए अपनी पुत्री को देने के लिए अंगीकार करके उनको विदा किया गया था और फिर वे महेश्वर के समीप में पहुँचे। उस सब मुनियों ने जिनमें मरीचि प्रधान थे, हे द्विजो! वहाँ से गमन किया था। जो कुछ भी शैलराज ने कहा था उन्होंने भगवान् शंकर से कह दिया था। हे हर! शैलराज तो अपनी कन्या को आपके लिए प्रदान करने को समुत्साहित हो रहा है। इस समय जो कुछ आप करना समुचित समझते हैं, वही आपको करना चाहिए। हे हर! अब हम लोगों को अपने आश्रम गमन करने की आज्ञा दीजिए। भगवान् हर ने साधन करने के योग्य कार्य सिद्धि समझ करके उन सब मुनियों को विदाई दे दी थी। एक-एक मुनि यथोचित रूप से सम्भाषण करके ही क्रम से विदा किया था। काली के साथ जब विवाह हो उस अवसर पर आप मेरे समीप में आइये। इस प्रकार से भगवान् हर के कहे हुए वचन की प्रतीक्षा करके ऋषिगण वहाँ से अपने आश्रमों को चले गये थे। माघ मास में-शुक्ल पक्ष में पञ्चमी तिथि और गुरुवार के दिन में उतरा फाल्गुनी नक्षत्र में भरणी आदि में रवि के स्थित होने पर वहाँ पर मुनिगण जिनमें मरीचि प्रधान थे वहाँ पर समागत हुए और ब्रह्मा आदि देवगण भी आ गये थे। उसी भाँति सब दिक्पाल मुनिगण शक्ति के सहित इन्द्र देव, ब्रह्माणी आदि मातायें, ब्रह्माणी के पुत्र देवर्षि नारदजी भी वहाँ पर गये थे। इन परिचरों के साथ आप अपने गणों के द्वारा आप्यायित भगवान् शम्भु ने विवाह सम्बन्धी विधि के साथ गिरिवर की
चन्द्रमा का खण्ड जो था वह भी किरणों से प्रज्वलित हो गया था।
൏൱ श्रीकालिका पुराण ൏൱ २७१ पुत्री को ग्रहण किया था। गिरिजा और शम्भु के विवाह में जो आठ सर्प शम्भु के शरीर में स्थित थे वे उस समय में सुवर्ण से सन्नद्ध अलंकार हो गए थे। महादेव दो भुजाओं वाले हो गये थे और जटायें सुन्दर केशों के स्वरूप में ही हो गयीं थीं। शम्भु के शिर में संस्थित चन्द्रमा का खण्ड जो था वह भी किरणों से प्रज्वलित हो गया था। हे द्विजो! उस अवसर पर व्याघ्र का जो चर्म था वह भी विचित्र वस्त्र के रूप वाला हो गया था। इनका जो भस्म का विलेपन था वह उस समय में परम सुगन्धित मलय चन्दन हो गया था। उस समय में भगवान् शम्भु सुन्दर स्वरूप से समन्वित होकर अद्भूत दर्शन वाले बन गये थे। इसके अनन्तर समस्त देवगण, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और गण सभी आश्चर्य से संयुत हो गये थे। ते सभी लोग भगवान् शम्भु को उस प्रकार के स्वरूप वाले हुए देखकर बहुत ही आश्चर्य में पड़े गये थे। हिमवान् भी अपने पुत्रों के सहित और अपनी पत्नी मेनका के साथ बहुत ही प्रसन्न हुए थे। सब हर का दर्शन करके जो कि बहुत ही मनोहर थे, यही कहने लगे थे कि वह तो साक्षात् ब्रह्माजी ही हैं। क्योंकि सब ही वेश शिव अर्थात् कल्याण करने वाला मंगलमय है इसी कारण से यह लोकों में यह अधिक शिव है इसलिए 'शिव' इस नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। जो पुरुष महेश्वर को उमा से युक्त इस प्रकार वाले का हृदय से स्मरण किया करता है उसका निरन्तर ही कल्याण होता है और जो भी कुछ मनोवांछित होता है वह भी हो जाता है। इसी प्रकार से महामाया योगनिद्रा जगत् को प्रसूत करने वाली काली पूर्व में दाक्षायणी अर्थात् दक्ष प्रजापति की पुत्री होकर पीछे गिरिजा हिमवान् की सुता हुई थी। काली स्वयं हर के सम्मोहित करने में समर्थ होती हुई भी उसने तथापि जगतों के लिए शिव ने उग्र तपश्चर्या का समाचरण किया था। इसी रीति से कालिका ने चन्द्रशेखर प्रभु को सम्मोहित किया था। हे द्विजो! जो कोई इस परम पुण्यमय कालिका देवी के चरित्र का कीर्तन करता है और उसको आधियाँ (मानसिक चिन्ताएं) और
२७२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ व्याधियाँ नहीं होती हैं और वह दीर्घायु हो जाता है । यह परम पवित्र है और कल्याण करने वाला है । इसका एक बार भी श्रवण करके मनुष्य शिवलोक का गमन किया करता है । जो श्राद्ध में आमन्त्रित विप्रों को इस महत् कालिका चरित्र का श्रवण कराता है उनके पितृगण कैवल्य को प्राप्त किया करते हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । आप लोगों के सामने यह परम पुण्यमय और समस्त पापों का विनाशक कह दिया है । हे सत्तमो! अब आप लोगों को जो भी रुचता हो, जो भी कुछ अन्य हो उसका श्रवण करिए । गौरी-शिव विहार वर्णन ऋषियों ने कहा- हे ब्रह्मन्! यह काली और हर का समागम अतीव विचित्र आपने वर्णन किया है जो यह परम पुण्यमय, पापों का हरण करने वाला, नित्य और श्रेष्ठ तथा श्रवण करने में सुख प्रदान करने वाला है । अब आप पुनः शिव का उत्तम तनु का अर्धभाग काली अथवा गौरी ने कैसे हरण किया था। वह कालिका किस प्रकार की है । हे मुनियों में श्रेष्ठ! हे द्विजो में उत्तम! किस कारण से शीघ्र ही काली गौरीत्व को प्राप्त हो गई । हमको यह तात्त्विक रूप से कहिए । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस महान् आख्यान को इस समय में आपके समाने कहूँगा । हे महर्षि गणों! इस परम शुभ देने वाले का आप लोग सब श्रवण कीजिए । यही बात पहले समय में राजा सगर ने और्व मुनि से पूछी थी । उन्होंने जिस प्रकार से कहा था वही मैं आप लोगों को बतलाता हूँ । प्राचीन समय में सोमवंश में एक सगर राजा हुआ । वह बलशाली, श्रीमान्, दक्ष और शास्त्रों के अर्थों का पारगामी विद्वान् था । वह राजा अपने एक ही रथ के द्वारा समस्त नृपों को जीतकर चक्रवर्ती हो गया था । उस राजा सगर को अभिनन्दित करने के लिए मुनिगण समागत हुए थे । पूर्व दिशा, उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम के मुनिगण और ब्राह्मण नृप के दर्शन करने के लिए समागत हुए थे । सबके समागत
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २७३ होने पर अग्नि के समान आत्मा वाले श्रीमान् और्व मुनि नृप का अभिनन्दन करने के लिए आये थे । उन मुनिवर का दर्शन करके जो जलती हुई अग्नि के सदृश थे, राजा सगर ने उनका अभ्यर्चन किया था । अर्घ्यपूर्वक पाद्य और आचमनीय देकर उन मुनिश्रेष्ठ को राजा ने श्रेष्ठ आसन पर निवेशित किया था । फिर उस सागर राजा ने महात्मा और्व से समुचित रीति से प्रणाम करके पूछा था कि आपका कुशल तो हैं । और मुनि श्रेष्ठ ने कहा था कि हे नरराज, मेरा सदा ही सर्वत्र कुशल है । मैं आपका दर्शन करने के लिए कुशलता के साथ उत्साह कराता हूँ । आप समस्त राजाओं में कुशाली हैं जिस एक ने ही आने पर बहुत शीघ्र ही समस्त राजाओं को जीत लिया था । हे राज नरोत्तम! आपका कुशल नित्य ही बढ़े । हे भूपते! नीति के अनुसार सद् आचरणों के द्वारा पृथिवी का शासन करिये । आपके समृद्ध होने पर जगत् की वृद्धि है अतएव उसी भाँति आप वृद्धि के लिए ही चेष्टा करिये जैसे चन्द्र की वृद्धि हुआ करती है । हे नृप! सबसे प्रथम सद्गुणों से समन्वित अपनी आत्मा को योजित करिये । इसके उपरान्त उसके गुणों से समन्वित भार्या को महिषी बनाइये । यदि वनिता को नित्य ही संयोजित किया जावे तो वह स्वयं ही अपने गुणों के विषय में प्रवेक्षण करने वाली होती हुई महती और व्रतधारण करने वाली हो जाती है । ऐसा सुना जाता है कि शम्भु में संगम सम वाली होती हुई हिमवान् की पुत्री बहुत सी क्रिया और अभ्युपायों के द्वारा शम्भु के द्वारा प्रायोजित कही गई थी । इसके अनन्तर शम्भु के अत्यधिक प्रेम से सती पार्वती ने उनकी ही अनुमति से उनके आधे शरीर का हरण कर लिया था । तभी से भगवान् शंकर अर्धनारी श्वर हो गये थे । हे नृप शार्दूल! उन्होंने फिर अन्य भार्या का ग्रहण नहीं किया था । इस कारण से, हे राजेन्द्र! आप भी अपनी जाया को उत्तर आत्मा से गुणों के द्वारा संयोजित कीजिये उसके उपरान्त लघु सुत को संयोजित करें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-राजा सगर भी इस और्व के द्वारा भाषित
२७४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
का श्रवण करके हर्ष से समन्वित हो गया और मन्द मुस्कान से संयुक्त होकर उसने मुनि से यह पूछा-उस सती गिरिजा देवी ने शंकर भगवान् के शरीर का आधा भाग कैसे हरण किया था ? हे द्विजश्रेष्ठो! उसे ही मैं श्रवण करना चाहता हूँ । जिस नीति से अपनी आत्मा का अर्थात् अपने आपका भार्या का अथवा सुत का योजन करना चाहिए उस नीति का और सदाचार संहिता का भी मैं श्रवण करना चाहता हूँ । हे द्विज, राजनीति, सत्पुरुषों की नीति और अन्य कृतात्माओं की नीति का मैं पृथक्-पृथक् श्रवण करने की इच्छा वाला हूँ। मैं आपकी प्रार्थना करता हूँ। हे ब्रह्मन्! यदि यह परम गोपनीय हो तो भी मैं सुनना चाहता हूँ। मैं उस भाँति से आपको कोई आज्ञा नहीं दे रहा हूँ और उसके ही समान मैं श्रवण करने का इच्छुक हूँ। कृपा करके आपको मुझे बतलाना चाहिए यदि वह बतलाने के योग्य हो तो हे मुनिवर! आप कहिए। द्विजो में परम श्रेष्ठ और्व ने भी उस राजा पर कृपालु होते हुए उस महान् आत्मा वाले के प्रति कहा। और्व ने कहा-हे राजन् आप श्रवण कीजिए। आपने यहाँ पर जो-जो भी पूछा है उसे मैं आप को बतलाऊँगा। पहले पुराने समय में हिमवान् की पुत्री ने जिस रीति से भगवान् हर के शरीर का आधा भाग का हरण किया था। हे नृपोत्तम! जहाँ पर आपको जैसी नीति करना चाहिए उसे और सबका सदाचार जो भी होना चाहिए इसे क्रम से ही मैं बतलाऊँगा यह आप श्रवण कीजिए। जिस समय में महात्मा शंकर ने हिमवान् की पुत्री के साथ विवाह किया था। वह उस समय कितने काल पर्यन्त वहाँ पर उमा के साथ रहे थे अर्थात् कितना समय व्यतीत किया था। शिखर पर कुन्ज में और पर्वत की दरियों में उसके साथ रमण करते हुए भगवान् हर ने पार्वती को प्रसन्न करते हुए वहाँ पर चिरकाल तक विहार किया था। काल के समाप्त होने पर भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित और अपनी भार्या के साथ स्वर्ग के समान कैलास पर्वत पर चले गये थे। उमा के साथ क्रीड़ा करते हुए ध्यान और आत्मा का चिन्तन त्याग दिया
था और उमा के मुखचन्द्र पर ही अपने नेत्रों को चकोर के ही भाँति बना लिया था अर्थात् वे सर्वदा उसके ही मुख का अवलोकन किया करते थे। किसी समय गिरिजा के लिए पुष्पों का समाहरण करके भगवान् शंकर अत्यन्त सुन्दर माला बनाया करते थे जो कि उसके सर्व अंगों में नीचे तक लटकने वाली होवे । किसी समय दर्पण में एक ही साथ अपना मुख और उमा देवी का मुख वृषभध्वज देखा करते थे। किसी अवसर पर कस्तूरिकाओं के द्वारा गन्धपत्रकों के विलेपनों से दोनों स्तनों पर भगवान् शंकर विलेपन किया करते थे। भगवान् शम्भु अम्बिका के शरीर पर गन्धसार का विलेपन करते थे और ललाट पर लगाकर उसे सुन्दर किया करते थे। चन्द्र के सामन घनी सन्धियों वाले उमा देवी के निर्माश से संसक्त केशपाशों में चित्रक लिखा करते थे। चन्दन, अगरु (गूगल), कस्तूरी और कुंकुम के विलोपनों के द्वारा विचित्र कर दिया करते थे। जिससे उन देवी का केशपाश विशेष रूप से शोभायमान हो जाता था। जो केशपाश नृत्य करने के लिए अवतीर्ण मयूर के पुच्छ की समता का धारण करने वाला हो जाया करता था। वृषभ ध्वज सुवर्ण से परिपूर्ण मनोहर कुण्डल आदि अलंकारों को उमादेवी के देह में समाकर्षित किया करते थे। उन सुवर्ण से विनितयोजित अलंकारों से गिरिजा देवी का शरीर जलदों से आपूर्ण तड़ित गणों से कालिका की ही भाँति शोभित हो रहा था। सम्पूर्ण दिव्य अलंकारों, अनेक प्रकार के रत्नों तथा सुन्दर वस्त्रों से पूर्ण रूप से मण्डित हुई काली ने प्रकृति देवी की सदृश्यता को धारण किया था। इस प्रकार से जगत् के पति भगवान् शम्भु सर्वदा उस काली में अनुराग से युक्त हो गये। उन्होंने जगत् के हित के लिए काली के साथ क्रीड़ा की थी। जगतों की माता, महामाया, जगन्माया काली, योगनिद्रा, जगत् की बुद्धि विद्या और अखिलविद्या के स्वरूप वाली थी। वह परमाभूति-प्रकृति और सर्ग-स्थिति और संहार के करने वाली थी। वह जगतों की हित की इच्छा करने वाली इसी कारण के भगवान् शंकर
का सम्मोहन करके सुधांशु के साथ चन्द्रिका की भाँति उनके साथ उस देवी ने रमण किया था।
बेताल भैरव उत्पत्ति
और्व मुनि ने कहा-इसके अनन्तर वे काल क्रम से ही महान् बल वाले प्रवृद्ध हो गये थे। वे शस्त्रों और अस्त्रों के ज्ञान में कुशल थे और शास्त्रों के अर्थों में परिनिष्ठत थे। वे यौवन के सम्प्राप्त करने वाले थे तथा परम दीप्त एवं परिपन्थियों के द्वारा दुर्धर्ष थे अर्थात् शत्रुगण उनके तेज को सहन नहीं कर सकते थे। वे धर्म और अर्थ के ज्ञान में परम प्रवीण थे तथा ब्रह्मण्य एवं सत्यवादी थे। वहाँ पर प्रीति से वेताल और भैरव सर्वदा सहचर थे। अलर्की, दमन और उपरिचर ये तीन थे। चन्द्रशेखर भाई सदा नित्य साथ में चरण करने वाले थे। राजा के तीन पुत्रों में जो उपचार प्रभृति थे उनमें अधिक ममत्व उसका था। किन्तु दो नित्य अधिक प्रीति और स्नेह वाले थे। चन्द्रशेखर नृप की वेताल और भैरव में भी वैसी प्रीति नहीं थी जैसी उनमें होती थी। वह चन्द्रशेखर नृप उन दोनों को देखकर कभी भी निरन्तर आह्लादित नहीं होता था अथवा पुत्र की बुद्धि से चाहता भी नहीं था। वे दोनों वीर धर्म में कुशल थे और महान् बल तथा पराक्रम से समन्वित थे। वे दोनों लोकों के विजय करने में दक्ष थे तथा शास्त्रों एवं अस्त्रों की विद्या में पारगामी थे।
नृप उन दोनों से डरा करता था कि ये दोनों वेताल और भैरव किस समय में मुझे-सुतों को अथवा राज्य को नष्ट कर देंगे। इसी चिन्ता में राजा नित्य ही वेताल और भैरव इन दोनों पुत्रों को भली भाँति प्रणत भी देखा करता था। इसके अनन्तर राजा ने उपरिचर को युवराज्य पद पर अभिषेक कर दिया था। वह सबसे बड़ा और समस्त राजाओं के गुणों से संयुत औरस पुत्र था। जो पीछे नीतियों के द्वारा समस्त राजाओं को योजित करेगा। उपरिचर नाम वाला समस्त शास्त्रों के अर्थों में पारंगत था। राजा ने दमन के लिए तथा अलर्क के लिए
दान दिया जिसमें बहुत धन रत्न थे तथा अधिक आसन और रथ थे। भाग के द्वारा उतना धन, रत्न आदि दास व वित्त उन दोनों के लिए नहीं दिए थे जो कि भैरव के लिए थे। इसके अनन्तर उन दोनों में क्रोध ने प्रवेश कर लिया था वे दोनों की क्रोध से अभिभूत हो गये और दोनों इधर-उधर विचरण करने लग गये। उन दोनों वीरों ने भोगों से उपभोग करने की इच्छा ही नहीं की और तपश्चर्या का समाचरण करने के लिए उद्यत हो गये। उन दोनों ने किसी भार्या से विवाह नहीं किया था अर्थात् वे दोनों अविवाहित थे तथा निरन्तर सदा ही निर्जन वन में वास किया करते थे। उस काल में देव वेताल और भैरव पुत्रों को उस प्रकार से रहने वाले हैं, ऐसा ज्ञान था उस समय में देवी तारावती चिन्ता से समाक्रान्त हो गयी थीं अर्थात् उसे बहुत अधिक चिन्ता समुत्पन्न हो गई थी। वह उपरिचर राजा से और अपने पति चन्द्रशेखर से भयभीत हो गई थी। वह सुन्दरी गुप्त रूप से दोनों का ज्ञान रखती हुई भी कुछ भी नहीं बोली थी। इसी बीच मुनियों में परम श्रेष्ठ और विद्वान कपोत चित्रांगदा के साथ सम्भोग और सुरतोत्सवों के द्वारा परम संतुष्ट होकर उस सहचारिणी एवं पुत्रों से युक्त चित्रांगदा का परित्याग करके उसने वहाँ से गमन करने की इच्छा की थी और उस अवसर पर उसने चित्रांगदा से यह वचन कहा था। मुनि ने कहा- चित्रांगदे! मैं तपस्या का समाचरण करने के लिए अब तपोवन में गमन करूँगा। वहाँ पर मैं तेरा क्या प्रिय कार्य करूँ ? हे मनोहर! उसी को मुझे तुम बतला दो। चित्रांगदा ने कहा- हे सुव्रत! तुम्परु और सुवर्चा ये दो आपके पुत्र हैं। मुनिश्रेष्ठ! आप इन दोनों का जो भी उचित हो वह प्रिय करो। हे द्विज श्रेष्ठ! मुझको भी मेरी भागिनि के घर में संस्थापित करके, हे अनघ! आपको यदि रुचता है तो सभी आप तपोवन में गमन करिये। मुनिश्रेष्ठ कपोत यह उसके वचन का श्रवण करके भली भाँति विचार करके हिरण्य (सुवर्ण) के लिए कुबेर के भवन में गये थे। उसने कुबेर से छः सौ सहस्त्र सुवर्ण के निष्कों की प्रार्थना की थी और
२७८ श्रीकालिका पुराण
प्राप्त कर लिया था। सौभार रत्नों को लाकर विप्र ने पुत्रों को दे दिया था और विशेष रूप से भार्या को दिया था। इसके उपरान्त पुत्रों तथा बहुत से धनों के साथ चित्रांगदा तथा पुत्रों के भी मत से सुवर्चा और तुम्बरु तथा चित्रांगदा को भी आमन्त्रित करके वह मुनि शार्दूल करवीरपुर में चला था। वहाँ जाकर वह कपोत राजा चन्द्रशेखर से तथा राजा उपरिचर से यह वाक्य बोला था। हे नृप! यह ककुत्स्थ की पुत्री है और यह पहले आपकी भी जानी हुई है। ये परम शुचि व सद्योजात ये दोनों इसके उदर से समुद्भूत मेरे पुत्र हैं। इन धनों के साथ आप मेरे दोनों पुत्रों को प्रतिपालन करें। राजोपरिचर भी यहाँ पर मेरे पुत्रों का परिपालन करें। जो पुत्रहीन होती है उसका पुत्र नृप ही होता है और जो धनहीन होता है उसका धन भी नृप ही हुआ करता है बिना माता वाले की जननी नृप हे और तात से रहित का पिता भी नृप ही हुआ करता है। अनाथ का नृप नाथ और बिना भर्ता वाले का पति नृप है। जिससे कोई भृत्य न होवे उसका भृत्य राजा ही है और नृप ही मनुष्यों में देवता है। इसलिए हे नृप! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। और्व ने कहा-इसके अनन्तर उस राजा ने द्विजोत्तम उस मुनि से इस प्रकार से कहा था कि मैं आपका वचन पूर्ण करूँगा और राजोपरिचर भी करेगा। इसके उपरान्त उस राजा ने मुनि की सम्मति से चित्रांगदा को ग्रहण कर लिया था और उसने दे दिया था। उस परिवार ने सुवर्चा को राज्य का आधा भाग दे दिया था। और उसी भाँति उस अवसर पर तुम्बरु को अपने सचिवों का अध्यक्ष बना दिया था। और कपोत भी पुत्र का अर्धभाग देखकर परम प्रसन्न हुआ और राजा का आमन्त्रण करके वह तप के लिए तपोवन को चला गया था। मार्ग में गमन करते हुए उस कपोत ने अकेले विचरण करते हुए, परम मनोहर और चन्द्र के ही समान भगवान् शम्भु के पुत्रों को देखा था और उन दोनों के मुख में बन्दर की सी-आकृति देखी थी। पूर्व में घटित कथा का स्मरण कर और उन दोनों को देखकर उस तपोधन ने उनसे पूछा था-आप दोनों कौन हैं जो कि देवगर्भ समान आभा वाले
हैं और मार्ग में उस बियाबान में एकाकी विचरण कर रहे हैं। हे नर श्रेष्ठों! यह मेरे कथित का आप उत्तर बताइये। इसके अनन्तर उन दोनों ने इनको प्रणिपात किया था और समजस सम्भाषण किया था अर्थात् समुचित बातचीत की थी। उन शंकर के दोनों पुत्रों ने कपोत नाम वाले मुनि श्रेष्ठ से कहा था-हे मुनि शार्दूल! हम दोनों चन्द्रशेखर के पुत्र हैं और तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए हैं। आप हमको जान लीजिए । हम आपके पदों में प्रणाम करते हैं। हम दोनों की राजा से निरन्तर अवज्ञा देखकर क्रोध से संयुक्त होते हुए हम सदा ही अकेले ही निर्जन वनों में भ्रमण करते हैं। सर्वदा प्रणत रहने वाले आत्मज पुत्रों की अवज्ञा करके नृप किसलिए हे महाभाग! दानमात्र को भी देने की इच्छा नहीं करता है। हे द्विज श्रेष्ठ! इसी कारण से हम दोनों तप का समाचरण करने के लिए इच्छा कर रहे हैं यदि आप उपदेश के द्वारा हमारे ऊपर अनुग्रह करते हैं। इसके अनन्तर उन दोनों के वचन का श्रवण करके मुनि श्रेष्ठ बोले। मुनि ने कहा-आप दोनों उस चन्द्रशेखर भूपति के पुत्र नहीं हैं। आप तो तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए शंकर के ही पुत्र हैं। आप दोनों महावीर्य सद्योजात हैं और वेतालत्व में समस्त हैं। आप भृंगी और महाकाल नाम वाले हैं। शाप के कारण से ही आप दोनों इस धरणीतल में समागत हुए हैं। तुम दोनों को यहाँ पर उसी कारण से वह प्रिय दान नहीं देना चाहता है। आप अपने पिता वृषभध्वज भगवान् शंकर की शरण में गमन कीजिए। वे ही शम्भु तुम दोनों को भी कुछ देंगे। इस उग्रतप से क्या लाभ है जिसका फल बहुत ही लम्बे समय में प्राप्त होता है। परम आत्मा को धारण करने वाले मुनि शार्दूल कपोत इतना कहकर जिनको अतीत वर्तमान और भविष्य का पूर्ण ज्ञान था, उन दोनों से उन सबने कहा था। जिस प्रकार से भृंगी और महाकाल को शाप प्राप्त हुआ था और वे धरणी पर समागत हुए थे। हे नृप! जैसे भगवान् शम्भु और गौरी पृथिवी पर आगत हुए थे। पहले उस मुनि के द्वारा तारावती को शाप