कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 263, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंᏋᏊ श्रीकालिका पुराण ᏋᏊ २६५ आप इधर-उधर से सुनकर ही ऐसा भाषण कर रहे हैं। आपने उनका कभी भी दर्शन नहीं किया है। इस कारण से मैं आपसे वरदान नहीं चाहती हूँ और न पति के विषय में जानना चाहती हूँ। गिरिजा ने उन विप्र को इतना ही कहकर अपनी सखी का मुख देखकर उस अवसर पर संशय में समारूढ़ होकर यह कहा था। इसलिए मैं इस समय स्तुति वाक्य के द्वारा उसका प्रायश्चित् करूँगी। जो भी कोई महान् आत्मा वालों की निन्दा का श्रवण करता है अथवा बुराई किया करता है उन दोनों का अपराध समान ही होता है, ऐसा मैंने अपने पिताजी के मुख से पूर्व में श्रवण किया है। इसी कारण से में इसको दूर करूँगी सो विप्र को निषेध कर दो अर्थात् रोक दो। उस काली ने यह सखी से कहकर अपराध के सम्मार्जन करने के लिए भगवान् शम्भु का स्तवन करना आरम्भ कर दिया। काली ने कहा-शान्त और कारणत्रय के हेतु अर्थात् सृष्टि स्थित और संहार इन तीनों के कारण स्वरूप शिव के लिए नमस्कार है। हे परमेश्वर! मैं अपने आपको निवेदन करती हूँ और आप ही मेरी गति हैं। विज्ञान, सौभाग्य और सुहृत में गत, प्रपञ्च से रहित हिरण्यबाहु, नारायण के नाभि पद्म से समुत्पन्न प्रधान बीज, जगत् के हितरूप आपके लिए नमस्कार। इस भाँति स्तवन करती हुई उसको यह द्विज पुनः उस समय कुछ कथन करने के लिए उद्यत होने वाला है यह समीक्षण करके काली को यत्न कर दिया था और गिरिराज की पुत्री ने समझ करके सखी से कहा था। यह द्विज कुछ कहना चाहता है और उग्र हर को नहीं जानता। अतएव यह उनकी निन्दा कर रहा है। किन्तु मैं प्राणों के हरण करने वाली शिव की निन्दा सुनने में समर्थ नहीं हूँ। हे सखी! इस समय जब तक इसके वचनों का श्रवण नहीं करूँ तब तक मैं दूर देश को गमन करती हूँ। हे मत्प्रिये! वहाँ पर दूर देश में समुपस्थित रहूँ। इतना कहकर वह काली हिमवान् की पुत्री उसी सखी के सहित प्रस्थान कर गई थी और द्विज को हठात् छोड़कर