भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 442 में से

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पृष्ठ 264

२६६ | श्रीकालिका पुराण

उठकर चली गयी थी। इसके अनन्तर निज रूप प्रकट होकर शंकर ने रूदन करती हुई हिमवान् की सुता के पीछे गमन किया था। शिव ने कहा-मैं ही महादेव हूँ और हर हूँ! क्या अब आप मेरा स्तवन नहीं करती है। हे काली! हे शांकरि!! मेरे सम्मुख होकर मुझे समाश्वासित करो। इतना कहकर वे महादेव काली के आगे गमन कर उपस्थित हो गये थे। उन्होंने दोनों हाथों को फैलाकर उस काली की गति का अवरोध किया था। वह गिरिराज की बेटी शम्भु के मुख को देख कर उसी क्षण बरबस नीचे की ओर मुख वाली हो गई थी जिस तरह से वायु से चकित तडित हो जाया करती है। प्रीति की लज्जा से मन्द नेत्रों वाली होते हुए उस समय में वह जड़ की ही भाँति हो गयी थी वह भामिनी बोलने की इच्छा वाली होती हुई भी बोलने में समर्थ न हो सकी थी। हे द्विजोत्तमो! मनोरथों की सिद्धि को जानने से उनका शरीर सुधा से पूरित के समान हो गया था और आनन्द से परिपूर्ण हो रहा था। नौ सहस्र वर्ष तक उस काली ने तपश्चर्या का क्लेश प्राप्त किया था। किन्तु उसी क्षण में उस सम्पूर्ण क्लेश का त्याग करके वह आनन्द से हर्षित हो गई थी। उस प्रकार से अवस्थित उसको प्रणय वाली देखकर वृषभध्वज भस्मीभूत कामदेव के द्वारा जो कि गात्र में विद्यमान था, मोहित हो गये थे। इसके अनन्तर विरह से उद्रिक्त होकर वृषभध्वज साथ में आकर सम्बोधन करते हुए आनन्द से यह चाटु वचन कहने लगे थे। हे सुन्दरी! क्या मुझसे कुछ भी कहना नहीं चाहती हैं ? तप के क्लेश का स्मरण करती हुई क्या इस समय में मुझ पर कुपित हो रही हैं। हे सुभगे! तुम्हारे बिना मैं परितप्त हो रहा हूँ। मेरे समय से जो आपने तप श्रर्या करने का सामारम्भ किया था। हे प्रिये! मैं अनुराग से युक्त हूँ। मैं संस्कार करके तुम्हारे साथ होऊँगा। मैंने जो प्राण किया था, व्यतीत हो गया। आप भी तप के लिए समुद्यत हुई थीं और उस तप से ही आप भली भाँति संस्कृत हो गई हैं। आपने भली-भाँति चिन्तन किया, तीव्र