कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
२६६ | श्रीकालिका पुराण
उठकर चली गयी थी। इसके अनन्तर निज रूप प्रकट होकर शंकर ने रूदन करती हुई हिमवान् की सुता के पीछे गमन किया था। शिव ने कहा-मैं ही महादेव हूँ और हर हूँ! क्या अब आप मेरा स्तवन नहीं करती है। हे काली! हे शांकरि!! मेरे सम्मुख होकर मुझे समाश्वासित करो। इतना कहकर वे महादेव काली के आगे गमन कर उपस्थित हो गये थे। उन्होंने दोनों हाथों को फैलाकर उस काली की गति का अवरोध किया था। वह गिरिराज की बेटी शम्भु के मुख को देख कर उसी क्षण बरबस नीचे की ओर मुख वाली हो गई थी जिस तरह से वायु से चकित तडित हो जाया करती है। प्रीति की लज्जा से मन्द नेत्रों वाली होते हुए उस समय में वह जड़ की ही भाँति हो गयी थी वह भामिनी बोलने की इच्छा वाली होती हुई भी बोलने में समर्थ न हो सकी थी। हे द्विजोत्तमो! मनोरथों की सिद्धि को जानने से उनका शरीर सुधा से पूरित के समान हो गया था और आनन्द से परिपूर्ण हो रहा था। नौ सहस्र वर्ष तक उस काली ने तपश्चर्या का क्लेश प्राप्त किया था। किन्तु उसी क्षण में उस सम्पूर्ण क्लेश का त्याग करके वह आनन्द से हर्षित हो गई थी। उस प्रकार से अवस्थित उसको प्रणय वाली देखकर वृषभध्वज भस्मीभूत कामदेव के द्वारा जो कि गात्र में विद्यमान था, मोहित हो गये थे। इसके अनन्तर विरह से उद्रिक्त होकर वृषभध्वज साथ में आकर सम्बोधन करते हुए आनन्द से यह चाटु वचन कहने लगे थे। हे सुन्दरी! क्या मुझसे कुछ भी कहना नहीं चाहती हैं ? तप के क्लेश का स्मरण करती हुई क्या इस समय में मुझ पर कुपित हो रही हैं। हे सुभगे! तुम्हारे बिना मैं परितप्त हो रहा हूँ। मेरे समय से जो आपने तप श्रर्या करने का सामारम्भ किया था। हे प्रिये! मैं अनुराग से युक्त हूँ। मैं संस्कार करके तुम्हारे साथ होऊँगा। मैंने जो प्राण किया था, व्यतीत हो गया। आप भी तप के लिए समुद्यत हुई थीं और उस तप से ही आप भली भाँति संस्कृत हो गई हैं। आपने भली-भाँति चिन्तन किया, तीव्र
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६७ जप किया और सदा तप किया था । आपने यह सब करके बड़ी भारी कीमत के द्वारा मुझे खरीद लिया है । अब मैं आपका दास गया हूँ मुझे नियोजित कीजिए । आप अपने अंग-संस्कार करके जटाओं के प्रसाधन में मेरा नियोजन करें । शरीर से वल्कल को हटाकर सुन्दर वस्त्रों का निवेशन करने में, हार नूपूर और काञ्ची आदि के परिधान करने में, हे शुभे! शीघ्र ही नियोजित करिए । मैंने जो कामदेव को दग्ध कर दिया था वह भस्म रूप से मेरे शरीर में स्थित है । मेरा प्रतिकार करके ही मुझे तुम्हारे ही सामने दग्ध कर देना चाहता है । हे मनोवर! अपने अंग के अमृत के दान के द्वारा उस कामग्नि से मेरा उद्धार करिये । हे दरिते! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये । काली-हर समागम वर्णन मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- भगवान् शम्भु ने वचन का श्रवण कर गिरिजा अत्यन्त हर्षित हो गई थी और उसने उस समय में शम्भु को अपना प्राप्त हुआ पति मान लिया था । काली ने सखी के मुख से भगवान् शंकर से कहा था । जिस रीति से शम्भु सुनने की इच्छा करते हुए वाक्य का श्रवण कर रहे हैं। यहाँ पर सन्धि में अति भेद से सज्जक प्रवृत्त नहीं होते हैं । शंकर हर मर्यादा से मेरे उस पाणि का ग्रहण करें । कन्या पिता के द्वारा दत्त हुआ करती है तप से दत्त (दी हुई) नहीं होती है । इससे हिमवान् पिता की भली भाँति प्रार्थना करके भगवान् हर वैवाहिक विधि से ही मेरे पाणि का ग्रहण करें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके अन्तर काली लज्जा से समन्वित होती हुई विराम को प्राप्त हो गई थी । उस अवसर पर भगवान् शम्भु ने भी उसके वचन को सर्वथा सत्य और तथ्य एवं उचित ही ग्रहण किया था । इसके उपरान्त भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित ही वहाँ निवास करने लगे थे । जिस प्रकार से पहले रहते थे उसी भाँति इस समय भी उस गंगावतरण शिखर पर रहते थे । वह काली अपनी सखियों के साथ घिरी हुई अपने पिता के घर में चली गयी । वह सती दीन होती हुई
२६८ श्रीकालिका पुराण
गुरुजनों के मुख का अवलोकन नहीं कर रही हैं। इसी बीच सात ऋषियों का मरीचि जिनमें प्रधान थे उन मुनियों का चन्द्रशेखर प्रभु ने उस समय काली का प्रार्थना करने के लिए चिन्तन किया था। उसी क्षण में कामदेव के अरि शम्भु के द्वारा चिन्तन किये हुए मुनिगण किसी के द्वारा आकृष्ट हुए की ही भाँति उनके समीप में समागत हो गये थे। भगवान् शम्भु ने मुनियों को दीपित सात अग्नियों के ही समान देखा था और वसिष्ठ मुनि ने समीप में सती अरुन्धती को भी देखा था। शिव ने मुनियों द्वारा भी न वर्जित किया हुआ योषित् का ग्रहण करना धर्म मान लिया था। फिर उन समस्त मुनियों ने वृषभध्वज की पूजा करके स्मरण से समाकर्षित हुए प्रहर्ष से यह उन्होंने प्रिय बोला था। ऋषियों ने कहा-जो प्रत्यक्ष शुद्ध रूप दिखाई देता है वह चन्द्र से प्रसिद्ध और चन्द्र के खण्ड से उपशोभित है। अन्तर में प्रज्ञ मुनियों का वह भावित स्वरूप है। युक्तों के द्वारा भाग्य के उदय होने से भाग्य देखा गया है। प्रज्ञा के अधीन, ध्यान, तन्त्र, नित्य ध्यान करने के योग्य, नित्य और स्वप्रकाश है अर्थात् अपने ही से प्रकाश वाला है। वाह्य तत्त्व से निरन्तर पुञ्जीभूत और समुचित प्राप्त करने के योग्य भगवान् शम्भु का उदार धाम है। नेत्र के सहित जिसके अग्रभाग को देख कर ही सूर्य के समान दर्शन ही परित्राण के लिए होता है। यह स्थान शर्व का नित्यधाम है। स्तुति करने के योग्य शम्भु के उस देह को भक्ति से नमस्कार है। जो प्रथम आदि भाग से प्रकाश करता है, जो वाम भाग स्थित है वह यहाँ पर ही नेता हैं, भगवान् हर के ललाट में विशेष रूप से शक्ति धारण किये हुए वह हमारी अपनी सिद्धि के लिए प्रथम होवे। जो प्रधान के स्वरूप वाला सत्त्व, रज और तम से समन्वित हे वह पुरुष समस्त जगतों का हर हमारे ऊपर प्रसन्न होवे। इस प्रकार से मुनिगण ने विनय से अवनत होते हुए देवों की भली-भाँति स्तुति करके कहा कि आपने किस प्रयोजन के लिए हम लोगों का स्मरण किया है उसे आप बताइये। उस मुनियों के उस वचन का श्रवण करके भगवान् शंकर ने हास करते हुए उन मुनियों से सबको पृथक्-पृथक् सम्भाषण करके कहा था।
६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८३ २६९ ईश्वर ने कहा- समस्त जगतों की भलाई के लिए तथा अपने आपको सम्भोग करने के लिए एवं सन्तान की वृद्धि के हेतु मैं दाराओं के ग्रहण करने की इच्छा करता हूँ। इस समय में आप लोग मेरी सहायता कीजिए और मेरे लिए आप लोग तुहिनाचल से काली की याचना करिए। काली महान् तप के द्वारा शीघ्र ही मुझ को अपना पति प्राप्त करे, किन्तु मैं उसको विधिपूर्वक ही ग्रहण करूँगा। इस कारण से उस गिरिराज से याचना करें। जिस तरह से शैलराज स्वयं काली को प्रदान करने का उत्साह करें। वैसे-वैसे आप करिए क्योंकि आप लोग तो वाणी के वैभव से समन्वित हैं अर्थात् बोलने में बहुत ही कुशल हैं। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-मुनि गण ने भगवान् हर का सम्बोधन किया फिर गिरिराज के गृह को चले गये थे। गिरिराज ने उनका अभ्यर्थन किया था फिर मुनियों ने गिरिराज से कहा कि जो मस्तक में चन्द्र धारण करने वाले देव हैं और जो देवों के भी देव माने गये हैं। जो शाप देने तथा अनुग्रह करने में समर्थ हैं। जो एक ही जगतों के स्वामी हैं। जो समस्त जगतों का प्रलय काल आने पर संहार किया करते हैं, जो भक्त को विभूति (वैभव) के प्रदान करने वाले और अनेक स्वरूपों के धारण करने वाले परम सुन्दर हैं। वे ही शंकर आपकी पुत्री को अपनी भार्या के रूप में ग्रहण करने की इच्छा कर रहे हैं। यदि आप उनको अपनी पुत्री के समान सुयोग्य वर देखते हो तो हे गिरिवर ! उन शम्भु के लिए अपनी पुत्री को दे दो। उनके द्वारा इस भाँति कहे हुए अचलराज अपने हृदय में स्थित दुहिता के प्रिय की चिरकाल पर्यन्त समझकर और सद्वचन से आनन्द प्राप्त करके फिर प्रकाश में यह कहा- हे मुनियो! में शार्दूल के ही समान अर्थात् परमाधिक श्रेष्ठ आप लोगों ने पधारकर ही मुझे पवित्र कर दिया है और आपने मेरा भी अभिप्राय परिपूर्ण कर दिया। आप लोगों ने जब मुझे आदेश दिया है तो मैं अपनी पुत्री को भगवान् शम्भु के लिए अवश्य ही समर्पित कर दूँगा। इसने पूर्व तपस्या का समाचरण करके
२७० श्रीकालिका पुराण उसके द्वारा ईश्वर को अपना पति चाहा था। यह तो विधाता का ही नियोजन है। इसको अन्यथा करने में कौन समर्थ हो सकता है अर्थात् इसके विरुद्ध करने की शक्ति किसी में भी नहीं। बिना शम्भु के अन्य कौन है जो मेरी पुत्री की प्रार्थना करने में समर्थ हो। जिसको हर ने ग्रहण कर लिया है उसका ग्रहण करने का अन्य कौन उत्साह करेगा। और वह काली भी अपने मन से मन्त्र को ग्रहण कर अन्य किसी की इच्छा ही नहीं कर रही हैं। इतना कहकर मेनका के साथ शम्भु के लिए अपनी पुत्री को देने के लिए अंगीकार करके उनको विदा किया गया था और फिर वे महेश्वर के समीप में पहुँचे। उस सब मुनियों ने जिनमें मरीचि प्रधान थे, हे द्विजो! वहाँ से गमन किया था। जो कुछ भी शैलराज ने कहा था उन्होंने भगवान् शंकर से कह दिया था। हे हर! शैलराज तो अपनी कन्या को आपके लिए प्रदान करने को समुत्साहित हो रहा है। इस समय जो कुछ आप करना समुचित समझते हैं, वही आपको करना चाहिए। हे हर! अब हम लोगों को अपने आश्रम गमन करने की आज्ञा दीजिए। भगवान् हर ने साधन करने के योग्य कार्य सिद्धि समझ करके उन सब मुनियों को विदाई दे दी थी। एक-एक मुनि यथोचित रूप से सम्भाषण करके ही क्रम से विदा किया था। काली के साथ जब विवाह हो उस अवसर पर आप मेरे समीप में आइये। इस प्रकार से भगवान् हर के कहे हुए वचन की प्रतीक्षा करके ऋषिगण वहाँ से अपने आश्रमों को चले गये थे। माघ मास में-शुक्ल पक्ष में पञ्चमी तिथि और गुरुवार के दिन में उतरा फाल्गुनी नक्षत्र में भरणी आदि में रवि के स्थित होने पर वहाँ पर मुनिगण जिनमें मरीचि प्रधान थे वहाँ पर समागत हुए और ब्रह्मा आदि देवगण भी आ गये थे। उसी भाँति सब दिक्पाल मुनिगण शक्ति के सहित इन्द्र देव, ब्रह्माणी आदि मातायें, ब्रह्माणी के पुत्र देवर्षि नारदजी भी वहाँ पर गये थे। इन परिचरों के साथ आप अपने गणों के द्वारा आप्यायित भगवान् शम्भु ने विवाह सम्बन्धी विधि के साथ गिरिवर की
चन्द्रमा का खण्ड जो था वह भी किरणों से प्रज्वलित हो गया था।
൏൱ श्रीकालिका पुराण ൏൱ २७१ पुत्री को ग्रहण किया था। गिरिजा और शम्भु के विवाह में जो आठ सर्प शम्भु के शरीर में स्थित थे वे उस समय में सुवर्ण से सन्नद्ध अलंकार हो गए थे। महादेव दो भुजाओं वाले हो गये थे और जटायें सुन्दर केशों के स्वरूप में ही हो गयीं थीं। शम्भु के शिर में संस्थित चन्द्रमा का खण्ड जो था वह भी किरणों से प्रज्वलित हो गया था। हे द्विजो! उस अवसर पर व्याघ्र का जो चर्म था वह भी विचित्र वस्त्र के रूप वाला हो गया था। इनका जो भस्म का विलेपन था वह उस समय में परम सुगन्धित मलय चन्दन हो गया था। उस समय में भगवान् शम्भु सुन्दर स्वरूप से समन्वित होकर अद्भूत दर्शन वाले बन गये थे। इसके अनन्तर समस्त देवगण, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और गण सभी आश्चर्य से संयुत हो गये थे। ते सभी लोग भगवान् शम्भु को उस प्रकार के स्वरूप वाले हुए देखकर बहुत ही आश्चर्य में पड़े गये थे। हिमवान् भी अपने पुत्रों के सहित और अपनी पत्नी मेनका के साथ बहुत ही प्रसन्न हुए थे। सब हर का दर्शन करके जो कि बहुत ही मनोहर थे, यही कहने लगे थे कि वह तो साक्षात् ब्रह्माजी ही हैं। क्योंकि सब ही वेश शिव अर्थात् कल्याण करने वाला मंगलमय है इसी कारण से यह लोकों में यह अधिक शिव है इसलिए 'शिव' इस नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। जो पुरुष महेश्वर को उमा से युक्त इस प्रकार वाले का हृदय से स्मरण किया करता है उसका निरन्तर ही कल्याण होता है और जो भी कुछ मनोवांछित होता है वह भी हो जाता है। इसी प्रकार से महामाया योगनिद्रा जगत् को प्रसूत करने वाली काली पूर्व में दाक्षायणी अर्थात् दक्ष प्रजापति की पुत्री होकर पीछे गिरिजा हिमवान् की सुता हुई थी। काली स्वयं हर के सम्मोहित करने में समर्थ होती हुई भी उसने तथापि जगतों के लिए शिव ने उग्र तपश्चर्या का समाचरण किया था। इसी रीति से कालिका ने चन्द्रशेखर प्रभु को सम्मोहित किया था। हे द्विजो! जो कोई इस परम पुण्यमय कालिका देवी के चरित्र का कीर्तन करता है और उसको आधियाँ (मानसिक चिन्ताएं) और
२७२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ व्याधियाँ नहीं होती हैं और वह दीर्घायु हो जाता है । यह परम पवित्र है और कल्याण करने वाला है । इसका एक बार भी श्रवण करके मनुष्य शिवलोक का गमन किया करता है । जो श्राद्ध में आमन्त्रित विप्रों को इस महत् कालिका चरित्र का श्रवण कराता है उनके पितृगण कैवल्य को प्राप्त किया करते हैं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है । आप लोगों के सामने यह परम पुण्यमय और समस्त पापों का विनाशक कह दिया है । हे सत्तमो! अब आप लोगों को जो भी रुचता हो, जो भी कुछ अन्य हो उसका श्रवण करिए । गौरी-शिव विहार वर्णन ऋषियों ने कहा- हे ब्रह्मन्! यह काली और हर का समागम अतीव विचित्र आपने वर्णन किया है जो यह परम पुण्यमय, पापों का हरण करने वाला, नित्य और श्रेष्ठ तथा श्रवण करने में सुख प्रदान करने वाला है । अब आप पुनः शिव का उत्तम तनु का अर्धभाग काली अथवा गौरी ने कैसे हरण किया था। वह कालिका किस प्रकार की है । हे मुनियों में श्रेष्ठ! हे द्विजो में उत्तम! किस कारण से शीघ्र ही काली गौरीत्व को प्राप्त हो गई । हमको यह तात्त्विक रूप से कहिए । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस महान् आख्यान को इस समय में आपके समाने कहूँगा । हे महर्षि गणों! इस परम शुभ देने वाले का आप लोग सब श्रवण कीजिए । यही बात पहले समय में राजा सगर ने और्व मुनि से पूछी थी । उन्होंने जिस प्रकार से कहा था वही मैं आप लोगों को बतलाता हूँ । प्राचीन समय में सोमवंश में एक सगर राजा हुआ । वह बलशाली, श्रीमान्, दक्ष और शास्त्रों के अर्थों का पारगामी विद्वान् था । वह राजा अपने एक ही रथ के द्वारा समस्त नृपों को जीतकर चक्रवर्ती हो गया था । उस राजा सगर को अभिनन्दित करने के लिए मुनिगण समागत हुए थे । पूर्व दिशा, उत्तर, दक्षिण तथा पश्चिम के मुनिगण और ब्राह्मण नृप के दर्शन करने के लिए समागत हुए थे । सबके समागत
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २७३ होने पर अग्नि के समान आत्मा वाले श्रीमान् और्व मुनि नृप का अभिनन्दन करने के लिए आये थे । उन मुनिवर का दर्शन करके जो जलती हुई अग्नि के सदृश थे, राजा सगर ने उनका अभ्यर्चन किया था । अर्घ्यपूर्वक पाद्य और आचमनीय देकर उन मुनिश्रेष्ठ को राजा ने श्रेष्ठ आसन पर निवेशित किया था । फिर उस सागर राजा ने महात्मा और्व से समुचित रीति से प्रणाम करके पूछा था कि आपका कुशल तो हैं । और मुनि श्रेष्ठ ने कहा था कि हे नरराज, मेरा सदा ही सर्वत्र कुशल है । मैं आपका दर्शन करने के लिए कुशलता के साथ उत्साह कराता हूँ । आप समस्त राजाओं में कुशाली हैं जिस एक ने ही आने पर बहुत शीघ्र ही समस्त राजाओं को जीत लिया था । हे राज नरोत्तम! आपका कुशल नित्य ही बढ़े । हे भूपते! नीति के अनुसार सद् आचरणों के द्वारा पृथिवी का शासन करिये । आपके समृद्ध होने पर जगत् की वृद्धि है अतएव उसी भाँति आप वृद्धि के लिए ही चेष्टा करिये जैसे चन्द्र की वृद्धि हुआ करती है । हे नृप! सबसे प्रथम सद्गुणों से समन्वित अपनी आत्मा को योजित करिये । इसके उपरान्त उसके गुणों से समन्वित भार्या को महिषी बनाइये । यदि वनिता को नित्य ही संयोजित किया जावे तो वह स्वयं ही अपने गुणों के विषय में प्रवेक्षण करने वाली होती हुई महती और व्रतधारण करने वाली हो जाती है । ऐसा सुना जाता है कि शम्भु में संगम सम वाली होती हुई हिमवान् की पुत्री बहुत सी क्रिया और अभ्युपायों के द्वारा शम्भु के द्वारा प्रायोजित कही गई थी । इसके अनन्तर शम्भु के अत्यधिक प्रेम से सती पार्वती ने उनकी ही अनुमति से उनके आधे शरीर का हरण कर लिया था । तभी से भगवान् शंकर अर्धनारी श्वर हो गये थे । हे नृप शार्दूल! उन्होंने फिर अन्य भार्या का ग्रहण नहीं किया था । इस कारण से, हे राजेन्द्र! आप भी अपनी जाया को उत्तर आत्मा से गुणों के द्वारा संयोजित कीजिये उसके उपरान्त लघु सुत को संयोजित करें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-राजा सगर भी इस और्व के द्वारा भाषित
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का श्रवण करके हर्ष से समन्वित हो गया और मन्द मुस्कान से संयुक्त होकर उसने मुनि से यह पूछा-उस सती गिरिजा देवी ने शंकर भगवान् के शरीर का आधा भाग कैसे हरण किया था ? हे द्विजश्रेष्ठो! उसे ही मैं श्रवण करना चाहता हूँ । जिस नीति से अपनी आत्मा का अर्थात् अपने आपका भार्या का अथवा सुत का योजन करना चाहिए उस नीति का और सदाचार संहिता का भी मैं श्रवण करना चाहता हूँ । हे द्विज, राजनीति, सत्पुरुषों की नीति और अन्य कृतात्माओं की नीति का मैं पृथक्-पृथक् श्रवण करने की इच्छा वाला हूँ। मैं आपकी प्रार्थना करता हूँ। हे ब्रह्मन्! यदि यह परम गोपनीय हो तो भी मैं सुनना चाहता हूँ। मैं उस भाँति से आपको कोई आज्ञा नहीं दे रहा हूँ और उसके ही समान मैं श्रवण करने का इच्छुक हूँ। कृपा करके आपको मुझे बतलाना चाहिए यदि वह बतलाने के योग्य हो तो हे मुनिवर! आप कहिए। द्विजो में परम श्रेष्ठ और्व ने भी उस राजा पर कृपालु होते हुए उस महान् आत्मा वाले के प्रति कहा। और्व ने कहा-हे राजन् आप श्रवण कीजिए। आपने यहाँ पर जो-जो भी पूछा है उसे मैं आप को बतलाऊँगा। पहले पुराने समय में हिमवान् की पुत्री ने जिस रीति से भगवान् हर के शरीर का आधा भाग का हरण किया था। हे नृपोत्तम! जहाँ पर आपको जैसी नीति करना चाहिए उसे और सबका सदाचार जो भी होना चाहिए इसे क्रम से ही मैं बतलाऊँगा यह आप श्रवण कीजिए। जिस समय में महात्मा शंकर ने हिमवान् की पुत्री के साथ विवाह किया था। वह उस समय कितने काल पर्यन्त वहाँ पर उमा के साथ रहे थे अर्थात् कितना समय व्यतीत किया था। शिखर पर कुन्ज में और पर्वत की दरियों में उसके साथ रमण करते हुए भगवान् हर ने पार्वती को प्रसन्न करते हुए वहाँ पर चिरकाल तक विहार किया था। काल के समाप्त होने पर भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित और अपनी भार्या के साथ स्वर्ग के समान कैलास पर्वत पर चले गये थे। उमा के साथ क्रीड़ा करते हुए ध्यान और आत्मा का चिन्तन त्याग दिया
था और उमा के मुखचन्द्र पर ही अपने नेत्रों को चकोर के ही भाँति बना लिया था अर्थात् वे सर्वदा उसके ही मुख का अवलोकन किया करते थे। किसी समय गिरिजा के लिए पुष्पों का समाहरण करके भगवान् शंकर अत्यन्त सुन्दर माला बनाया करते थे जो कि उसके सर्व अंगों में नीचे तक लटकने वाली होवे । किसी समय दर्पण में एक ही साथ अपना मुख और उमा देवी का मुख वृषभध्वज देखा करते थे। किसी अवसर पर कस्तूरिकाओं के द्वारा गन्धपत्रकों के विलेपनों से दोनों स्तनों पर भगवान् शंकर विलेपन किया करते थे। भगवान् शम्भु अम्बिका के शरीर पर गन्धसार का विलेपन करते थे और ललाट पर लगाकर उसे सुन्दर किया करते थे। चन्द्र के सामन घनी सन्धियों वाले उमा देवी के निर्माश से संसक्त केशपाशों में चित्रक लिखा करते थे। चन्दन, अगरु (गूगल), कस्तूरी और कुंकुम के विलोपनों के द्वारा विचित्र कर दिया करते थे। जिससे उन देवी का केशपाश विशेष रूप से शोभायमान हो जाता था। जो केशपाश नृत्य करने के लिए अवतीर्ण मयूर के पुच्छ की समता का धारण करने वाला हो जाया करता था। वृषभ ध्वज सुवर्ण से परिपूर्ण मनोहर कुण्डल आदि अलंकारों को उमादेवी के देह में समाकर्षित किया करते थे। उन सुवर्ण से विनितयोजित अलंकारों से गिरिजा देवी का शरीर जलदों से आपूर्ण तड़ित गणों से कालिका की ही भाँति शोभित हो रहा था। सम्पूर्ण दिव्य अलंकारों, अनेक प्रकार के रत्नों तथा सुन्दर वस्त्रों से पूर्ण रूप से मण्डित हुई काली ने प्रकृति देवी की सदृश्यता को धारण किया था। इस प्रकार से जगत् के पति भगवान् शम्भु सर्वदा उस काली में अनुराग से युक्त हो गये। उन्होंने जगत् के हित के लिए काली के साथ क्रीड़ा की थी। जगतों की माता, महामाया, जगन्माया काली, योगनिद्रा, जगत् की बुद्धि विद्या और अखिलविद्या के स्वरूप वाली थी। वह परमाभूति-प्रकृति और सर्ग-स्थिति और संहार के करने वाली थी। वह जगतों की हित की इच्छा करने वाली इसी कारण के भगवान् शंकर
का सम्मोहन करके सुधांशु के साथ चन्द्रिका की भाँति उनके साथ उस देवी ने रमण किया था।
बेताल भैरव उत्पत्ति
और्व मुनि ने कहा-इसके अनन्तर वे काल क्रम से ही महान् बल वाले प्रवृद्ध हो गये थे। वे शस्त्रों और अस्त्रों के ज्ञान में कुशल थे और शास्त्रों के अर्थों में परिनिष्ठत थे। वे यौवन के सम्प्राप्त करने वाले थे तथा परम दीप्त एवं परिपन्थियों के द्वारा दुर्धर्ष थे अर्थात् शत्रुगण उनके तेज को सहन नहीं कर सकते थे। वे धर्म और अर्थ के ज्ञान में परम प्रवीण थे तथा ब्रह्मण्य एवं सत्यवादी थे। वहाँ पर प्रीति से वेताल और भैरव सर्वदा सहचर थे। अलर्की, दमन और उपरिचर ये तीन थे। चन्द्रशेखर भाई सदा नित्य साथ में चरण करने वाले थे। राजा के तीन पुत्रों में जो उपचार प्रभृति थे उनमें अधिक ममत्व उसका था। किन्तु दो नित्य अधिक प्रीति और स्नेह वाले थे। चन्द्रशेखर नृप की वेताल और भैरव में भी वैसी प्रीति नहीं थी जैसी उनमें होती थी। वह चन्द्रशेखर नृप उन दोनों को देखकर कभी भी निरन्तर आह्लादित नहीं होता था अथवा पुत्र की बुद्धि से चाहता भी नहीं था। वे दोनों वीर धर्म में कुशल थे और महान् बल तथा पराक्रम से समन्वित थे। वे दोनों लोकों के विजय करने में दक्ष थे तथा शास्त्रों एवं अस्त्रों की विद्या में पारगामी थे।
नृप उन दोनों से डरा करता था कि ये दोनों वेताल और भैरव किस समय में मुझे-सुतों को अथवा राज्य को नष्ट कर देंगे। इसी चिन्ता में राजा नित्य ही वेताल और भैरव इन दोनों पुत्रों को भली भाँति प्रणत भी देखा करता था। इसके अनन्तर राजा ने उपरिचर को युवराज्य पद पर अभिषेक कर दिया था। वह सबसे बड़ा और समस्त राजाओं के गुणों से संयुत औरस पुत्र था। जो पीछे नीतियों के द्वारा समस्त राजाओं को योजित करेगा। उपरिचर नाम वाला समस्त शास्त्रों के अर्थों में पारंगत था। राजा ने दमन के लिए तथा अलर्क के लिए
दान दिया जिसमें बहुत धन रत्न थे तथा अधिक आसन और रथ थे। भाग के द्वारा उतना धन, रत्न आदि दास व वित्त उन दोनों के लिए नहीं दिए थे जो कि भैरव के लिए थे। इसके अनन्तर उन दोनों में क्रोध ने प्रवेश कर लिया था वे दोनों की क्रोध से अभिभूत हो गये और दोनों इधर-उधर विचरण करने लग गये। उन दोनों वीरों ने भोगों से उपभोग करने की इच्छा ही नहीं की और तपश्चर्या का समाचरण करने के लिए उद्यत हो गये। उन दोनों ने किसी भार्या से विवाह नहीं किया था अर्थात् वे दोनों अविवाहित थे तथा निरन्तर सदा ही निर्जन वन में वास किया करते थे। उस काल में देव वेताल और भैरव पुत्रों को उस प्रकार से रहने वाले हैं, ऐसा ज्ञान था उस समय में देवी तारावती चिन्ता से समाक्रान्त हो गयी थीं अर्थात् उसे बहुत अधिक चिन्ता समुत्पन्न हो गई थी। वह उपरिचर राजा से और अपने पति चन्द्रशेखर से भयभीत हो गई थी। वह सुन्दरी गुप्त रूप से दोनों का ज्ञान रखती हुई भी कुछ भी नहीं बोली थी। इसी बीच मुनियों में परम श्रेष्ठ और विद्वान कपोत चित्रांगदा के साथ सम्भोग और सुरतोत्सवों के द्वारा परम संतुष्ट होकर उस सहचारिणी एवं पुत्रों से युक्त चित्रांगदा का परित्याग करके उसने वहाँ से गमन करने की इच्छा की थी और उस अवसर पर उसने चित्रांगदा से यह वचन कहा था। मुनि ने कहा- चित्रांगदे! मैं तपस्या का समाचरण करने के लिए अब तपोवन में गमन करूँगा। वहाँ पर मैं तेरा क्या प्रिय कार्य करूँ ? हे मनोहर! उसी को मुझे तुम बतला दो। चित्रांगदा ने कहा- हे सुव्रत! तुम्परु और सुवर्चा ये दो आपके पुत्र हैं। मुनिश्रेष्ठ! आप इन दोनों का जो भी उचित हो वह प्रिय करो। हे द्विज श्रेष्ठ! मुझको भी मेरी भागिनि के घर में संस्थापित करके, हे अनघ! आपको यदि रुचता है तो सभी आप तपोवन में गमन करिये। मुनिश्रेष्ठ कपोत यह उसके वचन का श्रवण करके भली भाँति विचार करके हिरण्य (सुवर्ण) के लिए कुबेर के भवन में गये थे। उसने कुबेर से छः सौ सहस्त्र सुवर्ण के निष्कों की प्रार्थना की थी और
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प्राप्त कर लिया था। सौभार रत्नों को लाकर विप्र ने पुत्रों को दे दिया था और विशेष रूप से भार्या को दिया था। इसके उपरान्त पुत्रों तथा बहुत से धनों के साथ चित्रांगदा तथा पुत्रों के भी मत से सुवर्चा और तुम्बरु तथा चित्रांगदा को भी आमन्त्रित करके वह मुनि शार्दूल करवीरपुर में चला था। वहाँ जाकर वह कपोत राजा चन्द्रशेखर से तथा राजा उपरिचर से यह वाक्य बोला था। हे नृप! यह ककुत्स्थ की पुत्री है और यह पहले आपकी भी जानी हुई है। ये परम शुचि व सद्योजात ये दोनों इसके उदर से समुद्भूत मेरे पुत्र हैं। इन धनों के साथ आप मेरे दोनों पुत्रों को प्रतिपालन करें। राजोपरिचर भी यहाँ पर मेरे पुत्रों का परिपालन करें। जो पुत्रहीन होती है उसका पुत्र नृप ही होता है और जो धनहीन होता है उसका धन भी नृप ही हुआ करता है बिना माता वाले की जननी नृप हे और तात से रहित का पिता भी नृप ही हुआ करता है। अनाथ का नृप नाथ और बिना भर्ता वाले का पति नृप है। जिससे कोई भृत्य न होवे उसका भृत्य राजा ही है और नृप ही मनुष्यों में देवता है। इसलिए हे नृप! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। और्व ने कहा-इसके अनन्तर उस राजा ने द्विजोत्तम उस मुनि से इस प्रकार से कहा था कि मैं आपका वचन पूर्ण करूँगा और राजोपरिचर भी करेगा। इसके उपरान्त उस राजा ने मुनि की सम्मति से चित्रांगदा को ग्रहण कर लिया था और उसने दे दिया था। उस परिवार ने सुवर्चा को राज्य का आधा भाग दे दिया था। और उसी भाँति उस अवसर पर तुम्बरु को अपने सचिवों का अध्यक्ष बना दिया था। और कपोत भी पुत्र का अर्धभाग देखकर परम प्रसन्न हुआ और राजा का आमन्त्रण करके वह तप के लिए तपोवन को चला गया था। मार्ग में गमन करते हुए उस कपोत ने अकेले विचरण करते हुए, परम मनोहर और चन्द्र के ही समान भगवान् शम्भु के पुत्रों को देखा था और उन दोनों के मुख में बन्दर की सी-आकृति देखी थी। पूर्व में घटित कथा का स्मरण कर और उन दोनों को देखकर उस तपोधन ने उनसे पूछा था-आप दोनों कौन हैं जो कि देवगर्भ समान आभा वाले
हैं और मार्ग में उस बियाबान में एकाकी विचरण कर रहे हैं। हे नर श्रेष्ठों! यह मेरे कथित का आप उत्तर बताइये। इसके अनन्तर उन दोनों ने इनको प्रणिपात किया था और समजस सम्भाषण किया था अर्थात् समुचित बातचीत की थी। उन शंकर के दोनों पुत्रों ने कपोत नाम वाले मुनि श्रेष्ठ से कहा था-हे मुनि शार्दूल! हम दोनों चन्द्रशेखर के पुत्र हैं और तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए हैं। आप हमको जान लीजिए । हम आपके पदों में प्रणाम करते हैं। हम दोनों की राजा से निरन्तर अवज्ञा देखकर क्रोध से संयुक्त होते हुए हम सदा ही अकेले ही निर्जन वनों में भ्रमण करते हैं। सर्वदा प्रणत रहने वाले आत्मज पुत्रों की अवज्ञा करके नृप किसलिए हे महाभाग! दानमात्र को भी देने की इच्छा नहीं करता है। हे द्विज श्रेष्ठ! इसी कारण से हम दोनों तप का समाचरण करने के लिए इच्छा कर रहे हैं यदि आप उपदेश के द्वारा हमारे ऊपर अनुग्रह करते हैं। इसके अनन्तर उन दोनों के वचन का श्रवण करके मुनि श्रेष्ठ बोले। मुनि ने कहा-आप दोनों उस चन्द्रशेखर भूपति के पुत्र नहीं हैं। आप तो तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए शंकर के ही पुत्र हैं। आप दोनों महावीर्य सद्योजात हैं और वेतालत्व में समस्त हैं। आप भृंगी और महाकाल नाम वाले हैं। शाप के कारण से ही आप दोनों इस धरणीतल में समागत हुए हैं। तुम दोनों को यहाँ पर उसी कारण से वह प्रिय दान नहीं देना चाहता है। आप अपने पिता वृषभध्वज भगवान् शंकर की शरण में गमन कीजिए। वे ही शम्भु तुम दोनों को भी कुछ देंगे। इस उग्रतप से क्या लाभ है जिसका फल बहुत ही लम्बे समय में प्राप्त होता है। परम आत्मा को धारण करने वाले मुनि शार्दूल कपोत इतना कहकर जिनको अतीत वर्तमान और भविष्य का पूर्ण ज्ञान था, उन दोनों से उन सबने कहा था। जिस प्रकार से भृंगी और महाकाल को शाप प्राप्त हुआ था और वे धरणी पर समागत हुए थे। हे नृप! जैसे भगवान् शम्भु और गौरी पृथिवी पर आगत हुए थे। पहले उस मुनि के द्वारा तारावती को शाप
२८० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ दिया गया था और पुराने समय में जिस तरह से वे दोनों तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए थे। अथवा जिस प्रकार से नारदजी के द्वारा नृप के संशय का छेदन हुआ था वह सभी कुछ गिरीश के पुत्रों से कह दिया था। उस समय वे दोनों महात्मा वेताल और भैरव यह श्रवण करके परम हर्ष से संयुक्त हुए थे। उस अवसर पर मोह से पूर्ण होकर सुधा से सिक्त के ही भाँति वे हो गये थे। फिर वेताल और भैरव ने कपोत मुनि से पूछा था। हम दोनों के पिता महादेव हैं-यह आपने सत्य ही कहा है। हे मुनि श्रेष्ठ! वे जिस रीति से हम दोनों के द्वारा आराधना करने योग्य होवें अथवा जिस स्थान पर उनकी आराधना की जावे जिससे हम दोनों को सिद्धि होवे। जिसके द्वारा वे शीघ्र ही प्रसन्नता को प्राप्त होवें। हे महामते! वह ही हमको आप बताने की कृपा करें। हम दोनों परम धन्य हैं कि आपने हम दोनों पर परम अनुग्रह किया है। हे मुनि श्रेष्ठ! आपने यह सब विज्ञापित कर दिया है और हम दोनों के हृदय कृतज्ञ हैं कि आपने हम दोनों पर अनुग्रह किया है। हे मुनि श्रेष्ठ! आपने यह सब विज्ञापित कर दिया है और हम दोनों के हृदय का शल्य आपने उद्धृत कर दिया है। अर्थात् हमारे हृदय का शल्य की ही भाँति जो दुःख था वह दूर कर दिया है। हे मुनीश्वर! आप तो कृपा से परिपूर्ण हैं। पुनः हमारे ऊपर दया कीजिए। जिस रीति से हम शीघ्र ही भर्ग की प्राप्ति कर लेवें उसी भाँति आप हम को बताइए। मुनि ने कहा-आप सुनिए, में आज बताता हूँ कि जहाँ पर आराधना किए हुए भगवान् हर शीघ्र ही आपके समझ में समागत हो जायेंगे। जहाँ पर नित्य ही महादेव निवास करते हुए तुष्टि के लिए होते हैं आप दोनों को उस स्थान को बता दूँगा। वह स्थान गोपनीय है। वाराणसी नाम वाली पुरी है जो परम सुन्दर भागीरथी गंगा के तट पर बसी हुई है वहाँ पर वृषभध्वज स्वयं नित्य ही निवास किया करते हैं। वे योगी सदा ही योगियों की प्रीति के करने वाले हैं। वे स्वयं योगी हैं और अध्यात्म चिन्तन करने वाले हैं। वह पुरी आकाश में संस्थित है और नित्य ही भगवान् भर्ग के योग से धारण की हुई है। वहाँ पर
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २८१ जो भी अपने प्राणों को त्यागकर मृत्यु को प्राप्त करता है तो यह पुरी उसको दिव्य ज्ञान प्रदान किया करती है। उस पुरुष को महादेव स्वयं ही संसार के आवागमन की ग्रन्थि के बन्धन का छुटकारा पाने के लिए कृपा किया करते हैं। वहाँ पर मृत होकर पुरुष दूसरे जन्म में उत्पन्न होकर परम योगी हो जाता है। भगवान् हर के द्वारा सम्मत होता हुआ वह सुलभ उपाय के द्वारा ही वह पुरुष निर्वाण पद को प्राप्त हो जाता है अर्थात् मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वहाँ योग से युक्त महादेव सदा पार्वती के सहित निवास किया करते हैं। देव, गन्धर्व यक्षों का और मनुष्यों को नित्य ही हर ज्ञेय (जानने के योग्य) और प्रकाश है और वह क्षेत्र प्रकाशित है। वहाँ पर देव कामनाओं का प्रदान करने वाले नहीं है और शीघ्र ही प्रसन्न नहीं होते हैं। चिरकाल प्रीति से आराधना किए हुए ही निर्वाण के लिए ही प्रसन्न हुआ करते हैं। वह पुरी गौरी के द्वारा विवर्जित है। वह योग का स्थान महाक्षेत्र हैं वहाँ किसी समय में शांकरी देवी गमन नहीं किया करती है। यह वाराणसी है।
कामरूपी पीठ का वर्णन
अत्यन्त तीव्र तप चिरकाल में मोक्ष के प्रदान करने वाला होता है। शीघ्र ही कामनाओं का देने वाला परम पुण्यमय क्षेत्र 'पीठ' कहा जाया करता है। पूर्व में वन्दना करने वालों के द्वारा वह क्षेत्र लोकों में चिरकाल में काम के प्रदान वाले का कहा जाता है। किन्तु जहाँ पर चिरकाल में भी ज्ञान देने वाले देव नहीं हैं। कामरूप महापीठ है जो गुह्य से भी परम गोपनीय है। वहाँ पर देव शंकर पार्वती के सहित सदा ही सन्निहित रहा करते हैं। वहाँ चिरकाल में पूजित हुए देव भी उस पीठ में प्रसन्न नहीं हुआ करते हैं। वहाँ पर शिव के भक्त पर देवी पार्वती निश्चय ही अनुग्रह किया करती है। परमेश्वर अपने भक्त के लिए शीघ्र ही कामना किया करते हैं उस पीठ के विषय में मैं बताऊँगा। अब आप दोनों श्रवण कीजिए। पूर्व में जहाँ तक दिक्कर
२८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ वासिनी हैं वहाँ पर करतोया नदी है। वह तीस योजन विस्तार वाली हैं और एक शतयोजन आयत है। वह त्रिकोण कृष्ण वर्ण से युक्त तथा बहुत से पर्वतों पूरित हैं। सौ नदियों से समायुक्त है और नाम कामरूप कीर्तित किया गया है। भगवान् शम्भु के नेत्र से भस्मीभूत हुए कामदेव ने भगवान् शम्भु के अनुग्रह से वहाँ पर रूप को प्राप्त किया था इसीलिए तभी से वह कामरूप हो गया था। उसी पीठ के मध्य भाग से वायव्य में, नैर्ऋत्य में, ऐशानी में और आग्नेयी में, मध्य में और पार्श्व में शंकर है। इन छःस्थानों में परम शोभन अपना आश्रम स्थान बना कर वहाँ पर भी पार्वती के साथ सब कार्यों को करते हुए नित्य ही शंकर निवास किया करते हैं। मध्य में देवी का गृह है। वहाँ पर उसी के अधीन शंकर हैं। वहाँ पर नील नामक श्रेष्ठ पर्वत में पार्वती विराजमान रहती हैं। ऐशानी दिशा में त्राटक शैल पर भगवान् शंकर का महान् आश्रम है। वहाँ पर नित्य ही ईश्वर निवास किया करते हैं और उनके अधीन पार्वती रहती हैं। और दूसरे हर तथा गौरी के सनातन आश्रम हैं किन्तु इन दोनों के सदृश कोई भी शंकर का आश्रम नहीं है। हे नर श्रेष्ठो! जहाँ पर आप दोनों के द्वारा महादेव आराधना करने के योग्य हैं उसी स्थान को मन से ग्रहण करके वृषभध्वज को प्रसन्न करिए।
- वेताल और भैरव ने कहा-हे मुनिवर! हम कापरूप को गमन करेंगे जो रहस्य पूर्ण नाटक पर्वत है। जहाँ पर गौरी हैं। जहाँ पर नित्य ही सन्निहित हुए संस्थित रहा करते हैं। हम दोनों को वहाँ पर अवश्य ही भगवान् भूतेश्वर की आराधना करनी चाहिए। हे द्विजोत्तम! जहाँ पर आराधना करेंगे उसी भाँति आप बताइए। ऋषि ने कहा-हे नर श्रेष्ठों! पर्वतों में श्रेष्ठ नाटक पर्वत पर आप जाइए। वहाँ पर नित्य ही महादेवजी अपर्णा के साथ रमण किया करते हैं। वहाँ पर सन्ध्याचल पर ब्रह्माजी के पुत्र वसिष्ठ मुनि भगवान् शंकर की आराधना किया करते हैं आप दोनों ही वहाँ पर चल जाइए और वे ही हर के आराधना के क्रम में तन्त्र के सहित मन्त्र ज्ञापित कर देंगे जबकि आप दोनों वेताल
श्रीकालिका पुराण २८३ और भैरव उनसे पूछेंगे। अब मैं तपश्चर्या करने के लिए जाना चाहता हूँ। यह समय ऐसे बिताना युक्त नहीं हैं। इससे हे वीर श्रेष्ठों! मुझको आप छोड़ दीजिए। इतना कहकर वह मुनिश्रेष्ठ कपोत वन में चला गया था। उन दोनों ने उस मुनि को प्रणाम किया था और फिर वह दोनों अपने भवन को चले गए थे। इसके अनन्तर उस समय में वे दोनों समय करके तपश्चर्या के लिए दीक्षित हुए थे। माता-पिता से अनुज्ञा प्राप्त करके भाइयों को और अन्य बान्धवों को भी ज्ञापित करके उन दोनों महामति वालों ने कामरूप के लिए प्रस्थान किया। उमा देवी के सहित भगवान् शंकर भी उन दोनों का गमन जानकर इन्द्र के सहित समस्त देवों को सान्त्वना देते हुए यह बोले। ईश्वर ने कहा-हे सुरेश्वरो! मेरे दोनों पुत्र तप करने के लिए गए हैं। वे दोनों मेरी आराधना में चित्त वाले हैं। वे सुर श्रेष्ठो! उन पर दया करो। इन दोनों पुत्रों का जो कि वेताल और भैरव नाम वाले हैं, तपस्या से संस्कार करके मैं इनको गाणपत्य में नियोजित करूँगा। हे निर्जरो! आप लोग उन दोनों का संस्कार कर दो। तप से उन दोनों के शरीर मानुषभाव त्याग कर जिस रीति से दोनों सारभाव को प्राप्त हो जावें, मैं वैसा ही करूँगा। इतना कहकर वामदेव भी पार्वती के साथ ही आकाश मार्ग से गमन करते हुए पुत्रों के पीछे स्नेह से गए थे। अपने पुत्रों के पीछे अनुगमन करते हुए भगवान् हर के पीछे-पीछे गमन करने लग गए थे। इसके अनन्तर उन दोनों ने जो इस समय कृष्ण हिरण कें चर्म का धारण करने वाले थे, उनको आगे एक नदी मिली थी। वे दोनों ही तापस के भाव को प्राप्त हुए थे। वह नदी हषद्वती थी जो कि गंगा के ही समान परम पावन थी। भगवान् त्र्यम्बक देव के द्वारा वे दोनों कामरूप नाम वाले आश्रम में समापतित हुए थे। कामरूप पहुँचकर करतोया नदी का जल मिला था। हे नृपोत्तम! उन दोनों ने नदी के जल में आचमन किया। फिर नन्दिकुण्ड पर पहुँचे थे। वहाँ आचमन तथा स्नपन करके फिर जठाद्भवा नदी पर गमन किया था। वहाँ पर दोनों ने उपस्पर्शन किया था और वहाँ पर तप के द्वारा
घृत नन्दिकुण्ड को प्रणाम किया तथा जल्पिश देव को प्रणिपात किया था और फिर नाटक नामक पर्वत पर गमन किया था। वहाँ पर्वत पर पहुँच कर वृषभध्वज को प्रणाम किया और आराधना के उपदेश के लिए कपोत वचन का स्मरण किया था। फिर दोनों दक्षिण दिशा की ओर गए थे जहाँ सन्ध्याचल संस्थित था। वहाँ पर कान्ता नाम की नदी थी जो वशिष्ठ मुनि ने अवतारित की थी। उस नदी के तट पर एक महान शैल था जिस पर छाया वाले वृक्ष और लताएँ थीं क्योंकि ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ जी ने वहाँ पर सन्ध्या वन्दना की थी। इसीलिए देवगण उस पर्वत का नाम सन्ध्याचल गाया करते हैं वहाँ पर पहुँचकर वशिष्ठ मुनि का दर्शन किया था जो साक्षात् अग्नि के ही तुल्य थे। वे वशिष्ठ मुनि भगवान गिरीश की आराधना कर रहे थे और उनका मन ध्यान में संयुक्त था। वे तपस्या की श्री से देदीप्यमान थे और दूसरे सूर्य के ही समान प्रतीत हो रहे थे। उस अवसर पर उनके समक्ष वेताल और भैरव ने प्रणाम किया था। हे भूप! वे दोनों विनय से अवनत होते हुए हाथों को जोड़े हुए स्थित हो गए थे। उन दोनों ने यह प्रणाम करते हुए विधाता के पुत्र से कहा कि चन्द्रशेखर से हम दोनों तारावती में उत्पन्न हुए हैं। इस क्षेत्र में हम दोनों भर्ग पुत्रों को मनुष्य ही जानिए। हम कार्य की सिद्धि के लिए भगवान् शम्भु की आराधना करने की इच्छा रखते हैं। हे सुब्रत! आप हम दोनों के अभीष्ट के विषय में अनुग्रह करें। उन दोनों के उस वचन का मुनियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ जी ने श्रवण किया और उन्होंने कहा था कि मैंने आप दोनों का ज्ञान प्राप्त कर दिया है और सत्य में आप दोनों ही भगवान् शम्भु के आत्मज हैं। हे नरश्रेष्ठ! आप दोनों को भगवान् शम्भु की आराधना करनी चाहिए। परमश्रेष्ठ आप दोनों यहाँ पर मेरा क्या कृत्य है यह बोलिए। वृषभराज की आराधना के लिए आप दोनों का प्रयोजन है। जो उसका निमित्त है वह सिद्ध हो गया है, वह चिन्तन कीजिए। वेताल और भैरव ने कहा-जिस मन्त्र के द्वारा अविलम्ब ही भली-भाँति भगवान् शम्भु की आराधना की गई
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २८५ है। हे महामुने! वह हमारे ऊपर अपनी पृथ्वी में प्रसन्नता को प्राप्त होंगे, यही हमको आप बतलाइए। हे मुनि शार्दूल! जिस रीति से हम आराधना करें, जो तन्त्र है और जैसा भी क्रम है, वह सभी आप उत्तम रूप में बताने के लिए योग्य होते हैं। जिस रीति से शीघ्र ही हर को प्राप्त कर लेवें। हे मुनिश्रेष्ठ! आप अनुशासन कीजिए। हम दोनों आपके प्रणत हैं। वशिष्ठ जी ने कहा-आप दोनों के ऊपर भगवान् वृषकेतु उमादेवी के सहित प्रसन्न हैं। यहाँ पर स्वयं शीघ्र प्रसाद को प्राप्त हो जायेंगे। समस्त देवगणों के साथ अपनी भार्या के साथ वृषभध्वज गृह से अपने पुत्रों का पालन करते हुए आकाश के मार्ग द्वारा समाक्षिप्त हैं। किन्तु आपके मनुष्य के देह का अधिवासन करके अर्थात् तपों व्रतों से संस्कार करके स्वयं ही कैलाश पर ले जायेंगे और गणपत्य दोनों का नियोजन करेंगे और मैं भी उपदेश कर दूँगा। जिससे आप दोनों ही शीघ्र ही भर्ग को प्राप्त कर लेंगे। हे पार्वती पुत्रों! उसे एकाग्रमन से श्रवण कीजिए। वे ध्यान से चिरकाल में प्रसन्न होते हैं और शीघ्र ध्यान पूजन से प्रसन्न होते हैं। इस कारण से आज तात्त्विक रूप से ध्यान और पूजन बतलाता हूँ। वे तेज से परिपूर्ण हैं, सदा शुद्ध स्वरूप हैं, ज्ञानामृत से विवर्धित हैं, जगत् से परिपूर्ण, चित् (ज्ञान) और आनन्दरूप हैं, शौरि और ब्रह्मा के सदा महान् योग से संयुत हैं, ये सम्पूर्ण जगत् उनके ही स्वरूप हैं। उनका कथन करने में कौन समर्थ है। किन्तु जिन रूपों से ये भगवान् शंकर विचरण किया करते हैं उनमें से जो मेरे ज्ञान के द्वारा गम्य है उसमें जो भी अभीष्ट है आप दोनों को मैं कहता हूँ। हे नरश्रेष्ठ! सबसे प्रथम मन्त्र का श्रवण करो उसके पश्चात् ध्यान से साक्षात्कार को सुनिए। इसके पश्चात् पूजा का क्रम फिर क्रम से व्रत को सुनिए। समस्त स्वरों में दीर्घ शेष होता है-इस रीति से पाँच मन्त्र कीर्तित किए गए हैं। एक-एक से वहाँ पर एक-एक वक्त्र तो देव का पूजन करना चाहिए अथवा एक को समुदित करके पाँचों से पूजन करें। इसके अनन्तर प्रसाद के द्वारा पंचवक्त्र देव का यजन करना