भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 442 में से

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पृष्ठ 269

൏൱ श्रीकालिका पुराण ൏൱ २७१ पुत्री को ग्रहण किया था। गिरिजा और शम्भु के विवाह में जो आठ सर्प शम्भु के शरीर में स्थित थे वे उस समय में सुवर्ण से सन्नद्ध अलंकार हो गए थे। महादेव दो भुजाओं वाले हो गये थे और जटायें सुन्दर केशों के स्वरूप में ही हो गयीं थीं। शम्भु के शिर में संस्थित चन्द्रमा का खण्ड जो था वह भी किरणों से प्रज्वलित हो गया था। हे द्विजो! उस अवसर पर व्याघ्र का जो चर्म था वह भी विचित्र वस्त्र के रूप वाला हो गया था। इनका जो भस्म का विलेपन था वह उस समय में परम सुगन्धित मलय चन्दन हो गया था। उस समय में भगवान् शम्भु सुन्दर स्वरूप से समन्वित होकर अद्भूत दर्शन वाले बन गये थे। इसके अनन्तर समस्त देवगण, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और गण सभी आश्चर्य से संयुत हो गये थे। ते सभी लोग भगवान् शम्भु को उस प्रकार के स्वरूप वाले हुए देखकर बहुत ही आश्चर्य में पड़े गये थे। हिमवान् भी अपने पुत्रों के सहित और अपनी पत्नी मेनका के साथ बहुत ही प्रसन्न हुए थे। सब हर का दर्शन करके जो कि बहुत ही मनोहर थे, यही कहने लगे थे कि वह तो साक्षात् ब्रह्माजी ही हैं। क्योंकि सब ही वेश शिव अर्थात् कल्याण करने वाला मंगलमय है इसी कारण से यह लोकों में यह अधिक शिव है इसलिए 'शिव' इस नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। जो पुरुष महेश्वर को उमा से युक्त इस प्रकार वाले का हृदय से स्मरण किया करता है उसका निरन्तर ही कल्याण होता है और जो भी कुछ मनोवांछित होता है वह भी हो जाता है। इसी प्रकार से महामाया योगनिद्रा जगत् को प्रसूत करने वाली काली पूर्व में दाक्षायणी अर्थात् दक्ष प्रजापति की पुत्री होकर पीछे गिरिजा हिमवान् की सुता हुई थी। काली स्वयं हर के सम्मोहित करने में समर्थ होती हुई भी उसने तथापि जगतों के लिए शिव ने उग्र तपश्चर्या का समाचरण किया था। इसी रीति से कालिका ने चन्द्रशेखर प्रभु को सम्मोहित किया था। हे द्विजो! जो कोई इस परम पुण्यमय कालिका देवी के चरित्र का कीर्तन करता है और उसको आधियाँ (मानसिक चिन्ताएं) और

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