कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २६७ जप किया और सदा तप किया था । आपने यह सब करके बड़ी भारी कीमत के द्वारा मुझे खरीद लिया है । अब मैं आपका दास गया हूँ मुझे नियोजित कीजिए । आप अपने अंग-संस्कार करके जटाओं के प्रसाधन में मेरा नियोजन करें । शरीर से वल्कल को हटाकर सुन्दर वस्त्रों का निवेशन करने में, हार नूपूर और काञ्ची आदि के परिधान करने में, हे शुभे! शीघ्र ही नियोजित करिए । मैंने जो कामदेव को दग्ध कर दिया था वह भस्म रूप से मेरे शरीर में स्थित है । मेरा प्रतिकार करके ही मुझे तुम्हारे ही सामने दग्ध कर देना चाहता है । हे मनोवर! अपने अंग के अमृत के दान के द्वारा उस कामग्नि से मेरा उद्धार करिये । हे दरिते! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये । काली-हर समागम वर्णन मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- भगवान् शम्भु ने वचन का श्रवण कर गिरिजा अत्यन्त हर्षित हो गई थी और उसने उस समय में शम्भु को अपना प्राप्त हुआ पति मान लिया था । काली ने सखी के मुख से भगवान् शंकर से कहा था । जिस रीति से शम्भु सुनने की इच्छा करते हुए वाक्य का श्रवण कर रहे हैं। यहाँ पर सन्धि में अति भेद से सज्जक प्रवृत्त नहीं होते हैं । शंकर हर मर्यादा से मेरे उस पाणि का ग्रहण करें । कन्या पिता के द्वारा दत्त हुआ करती है तप से दत्त (दी हुई) नहीं होती है । इससे हिमवान् पिता की भली भाँति प्रार्थना करके भगवान् हर वैवाहिक विधि से ही मेरे पाणि का ग्रहण करें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके अन्तर काली लज्जा से समन्वित होती हुई विराम को प्राप्त हो गई थी । उस अवसर पर भगवान् शम्भु ने भी उसके वचन को सर्वथा सत्य और तथ्य एवं उचित ही ग्रहण किया था । इसके उपरान्त भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित ही वहाँ निवास करने लगे थे । जिस प्रकार से पहले रहते थे उसी भाँति इस समय भी उस गंगावतरण शिखर पर रहते थे । वह काली अपनी सखियों के साथ घिरी हुई अपने पिता के घर में चली गयी । वह सती दीन होती हुई