कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७८ श्रीकालिका पुराण
प्राप्त कर लिया था। सौभार रत्नों को लाकर विप्र ने पुत्रों को दे दिया था और विशेष रूप से भार्या को दिया था। इसके उपरान्त पुत्रों तथा बहुत से धनों के साथ चित्रांगदा तथा पुत्रों के भी मत से सुवर्चा और तुम्बरु तथा चित्रांगदा को भी आमन्त्रित करके वह मुनि शार्दूल करवीरपुर में चला था। वहाँ जाकर वह कपोत राजा चन्द्रशेखर से तथा राजा उपरिचर से यह वाक्य बोला था। हे नृप! यह ककुत्स्थ की पुत्री है और यह पहले आपकी भी जानी हुई है। ये परम शुचि व सद्योजात ये दोनों इसके उदर से समुद्भूत मेरे पुत्र हैं। इन धनों के साथ आप मेरे दोनों पुत्रों को प्रतिपालन करें। राजोपरिचर भी यहाँ पर मेरे पुत्रों का परिपालन करें। जो पुत्रहीन होती है उसका पुत्र नृप ही होता है और जो धनहीन होता है उसका धन भी नृप ही हुआ करता है बिना माता वाले की जननी नृप हे और तात से रहित का पिता भी नृप ही हुआ करता है। अनाथ का नृप नाथ और बिना भर्ता वाले का पति नृप है। जिससे कोई भृत्य न होवे उसका भृत्य राजा ही है और नृप ही मनुष्यों में देवता है। इसलिए हे नृप! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। और्व ने कहा-इसके अनन्तर उस राजा ने द्विजोत्तम उस मुनि से इस प्रकार से कहा था कि मैं आपका वचन पूर्ण करूँगा और राजोपरिचर भी करेगा। इसके उपरान्त उस राजा ने मुनि की सम्मति से चित्रांगदा को ग्रहण कर लिया था और उसने दे दिया था। उस परिवार ने सुवर्चा को राज्य का आधा भाग दे दिया था। और उसी भाँति उस अवसर पर तुम्बरु को अपने सचिवों का अध्यक्ष बना दिया था। और कपोत भी पुत्र का अर्धभाग देखकर परम प्रसन्न हुआ और राजा का आमन्त्रण करके वह तप के लिए तपोवन को चला गया था। मार्ग में गमन करते हुए उस कपोत ने अकेले विचरण करते हुए, परम मनोहर और चन्द्र के ही समान भगवान् शम्भु के पुत्रों को देखा था और उन दोनों के मुख में बन्दर की सी-आकृति देखी थी। पूर्व में घटित कथा का स्मरण कर और उन दोनों को देखकर उस तपोधन ने उनसे पूछा था-आप दोनों कौन हैं जो कि देवगर्भ समान आभा वाले