भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 442 में से

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पृष्ठ 29

हुई भी श्रुति सम्पन्ना हैं। आप तपस्विनी हैं तथा कर चरणों से रहित हैं, आप महान् हैं। आप द्यौ हैं, आप चल हैं, आप ही ज्योति तथा वायु हैं। आप नभ, मन और अहंकार भी हैं। आप जगतों की आठ प्रकार की प्रकृति तथा कृति हैं। आप जगत् की नाभि और परा मेरुरूप धारिणी हैं। आप परानिकट हैं। आप परायणात्मिका अर्थात् पर और अपर स्वरूप वाली हैं। आप शुद्धा-माया और अति मोह के करने वाले हैं। आप कारण और कार्यभूत हैं। हे शिवाशिवे ! आप सत्य और शान्त हैं। आपके रूप विश्व के अर्थ में राग, वृक्ष और फल हैं। आप नितान्त छोटी और दीर्घ हैं। आपका स्वरूप नितान्त अणु और वृहत् हैं। आप सूक्ष्मा होती हुई भी सम्पूर्ण लोक में व्याप्त रहने वाली हैं, आप जगत् से परिपूर्ण हैं। आप मात्र से हीन, विमाना, अति विमाना और उन्मान और समुद्भूता हैं। आप ऐसी हैं जो अष्टि-व्यष्टि, सम्भोग और राग आदि से गलित आशय वाली रहती हैं। वह आपकी महिमा में आपको जो भ्रान्ति आदिक है वह आपका ही स्वरूप है। आप इष्ट और अनिष्ट के विपाक के ज्ञान रखने वाली हैं और यथेष्ट तथा अनिष्ट का कारण हैं। आप सर्गादि, मध्य तथा अन्त से परिपूर्ण हैं और उसी भाँति आपका रूप है। आठ अंगों वाले योग से बारम्बार इस प्रकार से सम्पादन करके जो तत्व स्थित किया जाता है वह ही आपका सनातन रूप है। बाह्य और अबाह्य में सुख तथा दुःख, ज्ञान और अज्ञान, लय और अलय, उपताप और शान्ति आप ही जगत् की स्वामिनी हैं। जिसके प्रभाव को तीनों लोकों में कोई भी कहने की शक्ति नहीं रखता है अर्थात् किसी के द्वारा भी प्रभाव नहीं कहा जा सकता है वह आप उनका भी सम्मोहन करने वाली हैं। ऐसा आपको मेरे द्वारा क्या स्तवन किया जा सकता है। आप योगनिद्रा, महानिद्रा, मोहनिद्रा, जगन्मयी, विष्ठमाया और प्रकृति हैं ऐसी आपको कौन स्तुति के द्वारा विभाजित करें जो मेरे विष्णु भगवान् और शंकर भगवान् के वपु के वहन करने की स्वरूप वाली हैं। उसके प्रभाव का कथन करने को और गुणगण का ज्ञान प्राप्त करने के लिए कौन समर्थ हो सकता है