कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३१ अर्थात् कोई भी ऐसी क्षमता नहीं रखता है। प्रकाशकारण, ज्योति स्वरूप के अन्तर में गोचर होने वाली आप ही जंगम में स्थेयरूपा एक वाह्य गोचर हैं। समस्त जगतों की जननी स्त्रीरूप वाली आप प्रसन्न होइए। हे विश्व रूपिणी! हे विश्वेशे! हे सनातनि! आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए। मार्कण्डेय मुनि ने कहा- विरञ्चि (ब्रह्मा) के द्वारा इस प्रकार से स्तवन की हुई वह योगनिद्रा परमात्मा ब्रह्मा के सामने आविर्भूत (प्रकट) हो गयी थी। उस प्रकट हुई देवी योगनिद्रा का स्वरूप का अब वर्णन किया जाता है। वह स्निग्ध अञ्जन की कान्ति के समान द्युति वाली थी, उसका स्वरूप परम सुन्दर था, वह उन्नत थीं और उनकी चार भुजायें थीं। वह सिंह के ऊपर सवार थीं, उनके हाथों में खड्ग और नीलकमल था, उसके केश पाश खुले हुए थे। सृष्टि के सृजन करने वाले जगत् गुरु ब्रह्माजी ने अपने समक्ष समुपस्थित उस देवी का अवलोकन करके उन्होंने अपने उन्नत कन्धों को विनम्र करके बड़े ही भक्ति के भाव से उन देवी को स्तवन किया और प्रणिपात किया था। ब्रह्माजी ने कहा- हे जगत् की प्रवृत्ति और निवृत्ति के रूप वाली! हे स्थिति और सर्ग (रचना) के स्वरूप से समन्विते! आपके चरणारविन्दों में मेरा बारम्बार नमस्कार है। चर और अचरों की आप शक्ति हैं, शाप सनातनी और सबका विमोहन करने वाली हैं। जो श्री सदा ही भगवान् शंकर की मूर्ति की माया है, जो विश्रम्भरा हैं और सबका विभरण किया करती हैं, जो ह्रीं, योगिनी, महिता औ मनोज्ञा हैं वह आप ऐसी हैं। हे परमात्मसारे ! आपको मेरा नमस्कार है। हे यामादि पूर्वे ! जिसका योगीजन अपने हृदय में प्रमिति के द्वारा प्रती का विभावन किया करते हैं वह आप प्रकाश शुद्ध, आदि से संयुता हैं, वह आप राग रहिता हैं। आप निश्चित रूप से विविध (अनेक) अवलम्बों वाली विद्या हैं आप कूटस्थ, अव्यक्त, अचिन्त्य रूप कालमय को धारण करने वाली हैं अर्थात् मरण करती हुई हैं। तात्पर्य यह है जगतों को विभरण करने वाली हैं। आप नित्य विकार बीज को करती हैं जो प्रयत्न है,