कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९२ श्रीकालिका पुराण हम लोग राज्य की इच्छा नहीं रखते हैं, न धन ही चाहते हैं और न अन्य कुछ ही इच्छा है । हे वृषभध्वज! आपकी भक्ति से आपकी सेवा करना चाहते हैं । आपके चरण कमल के युग्म ही मधुकर की स्वरूपता को प्राप्त होवें । आपके प्रसन्न होने पर नेत्रों का जोड़ा सदा ही सफलता को प्राप्त होगा । यहाँ से आगे अन्य प्रकार से आपके चिन्तनों से, आपके ध्यानों से और आपके पूजनों से हम दोनों के करोड़ों सहस्र कल्प भली भाँति व्यतीत होवें । इसके अनन्तर महादेवजी ने हँसते हुए ही सब देवगणों के साथ उन दोनों को देवत्व कर दिया था । भगवान शंकर ने देवेन्द्र की सम्मति से ही अमृत को लाकर उसको बेताल और भैरव को पिला दिया था । हे नरश्रेष्ठों! भगवान् शिव की शक्ति से अमृत के पी लेने पर उन दोनों ने मृत्युभाव का परित्याग करके अर्थात् मृत्यु के मुँह में जाने के भाव का त्याग करके वे दोनों ही अमर्त्यता को प्राप्त हो गए थे । उस अवसर में स्वपन करते हुए वे दोनों दिव्य ज्ञान और बल से समन्वित हो गए थे । वे दिव्य रूप से सम्पन्न अरियों के दमन करने वाले हो गए । इसी अभिन्न देह के द्वारा देवत्व को प्राप्त हुए उन दोनों से भगवान् शम्भु बोले । भगवान् ने कहा-मैं तो आप दोनों पर परम प्रसन्न हूँ । मेरे दिए हुए काम की इच्छा करते हुए आप दोनों मेरी दयिता पार्वती ईश्वरी की आराधना करो । उनके बिना मैं सनातन अभीष्ट नहीं दे सकता हूँ । उनकी नित्य सेवा करने के लिए शिवा पार्वती देवी की शरण में गमन कीजिए । जिस भाव से शीघ्र ही वह देवी प्रीति को प्राप्त हो जावें वहाँ पर अथवा यहाँ पर गमन करके उसी भाव से उनका समर्चन करिए । अठारह पटल वाला महामाया कल्प और्व मुनि ने कहा-इस प्रकार से भूतेश्वर प्रभु के कथन करने पर उस समय में वेताल भैरव दोनों ही वे हर्ष से प्रफुल्ल लोचनों वाले व्योम केश भगवान् से बोले । वेताल भैरव दोनों ने कहा-हे भगवान् ! हम दोनों देवी पार्वती का ध्यान-मन्त्र और विधि नहीं जानते हैं । हम