कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमन्वित, चार भुजाओं वाली विवसना और पीन तथा उन्नत पयोधरों से शोभित, सिद्धसूत्र को धारण करने वाली और वाम हाथों से अभयदान तथा वरदान को धारण करने वाली निम्न अर्थात् गम्भीर नाभि क्रम से आयात, क्षीण मध्य भाग वाली, मनोहर, आनमित नागपाशों के सदृश ऊरुओं से युक्त, गुप्त, गुल्फों वाली सुन्दर पाणियों से संयुक्त, बद्ध संकल्प वाली, नीवीरासन से राजित, गात्र से रत्न संस्तम्भ को भली भाँति आलम्बन करके संस्थिता । बारम्बार क्या चाहते हो, इस तरह से बोलती हुई, पाँच आननों वाली, पुरः संस्थित का निरीक्षण करती हुई, सुन्दर वाहन वाली, मुक्तावली, स्वर्ण, रत्न हार और किंकणी आदि समस्त आभूषण के समूहों से उज्जवल, स्मित हास्य सहित मुख वाली, करोड़ों सूर्यों के सदृश, समस्त सुलक्षणों से समन्वित नूतन यौवन से सम्पन्न तथा सभी अंग प्रत्यंगों से सुन्दरी, ऐसी अम्बिका देवी का ध्यान करके 'नमः फट्' इस मन्त्र से स्वकीय मस्तक मैं मैं ही हूँ ऐसा चिन्तन करके प्रथम देवे । इसके अनन्तर अंगों का न्यास और करों का न्यास क्रम से करना चाहिए । फिर हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र इनमें क्रम से न्यास करे । इसके अनन्तर मूल मन्त्र का मुख में, पृष्ठ में, उदर में, दोनों बाहुओं में, गुह्य में, दोनों पादों में, दोनों जाघों में क्रम से आठ अक्षरों का विन्यास करे । तथा ओंकार का स्मरण करते रहें । इस प्रकार से अत्यन्त शुद्ध देह वाला होकर पूजा सदा ही उचित होती है । अन्य प्रकार से उचित नहीं होती है । यह शरीर की शुद्धि, मन का निवेश, भूतों का प्रसार किया करती हैं । भगवान् ने कहा-इसके उपरान्त अर्घ्यपात्र में उस मन्त्र को आठ भागों में विभक्त करके भली-भाँति तप्त करे । उससे जल को, पुष्पों को, अपने मण्डल को, आसन को अशोधित करे । इसके पीछे पूजा के उपकरणों का सम करे । 'ओं ऐं ह्रीं' इस मन्त्र के द्वारा शब्द प्रांशु विवर्जित द्वारपाल को और फिर देवी के आसनों का पूजन करना चाहिए । नन्दि, भृंगि, मद्य, काल गणेश, द्वारपाल का उत्तर आदि क्रम