कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें२९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ से पूजन करने के योग्य है और मध्य में आसन पूजन के योग्य है । आधार शक्ति आदि हे भैरव! पूजा कल्पों में समस्त तन्त्रों में प्रसिद्ध हेमेन्द्र यन्त्रों का पूजन करे । दश दिक्पालों के सहित धर्मादिकों को मण्डल के अग्नि आदि कोणों में पार्श्वदेश से यजन करना चाहिए । सूर्य, अग्नि, सोम, मरुत, इनके मण्डलों को, पद्मक को, रज, सत्व, तम को, योगपीठ को, गुरुदेव के चरण को नार से आदि लेकर भद्रपीठ के अन्त तक सांगोपाँगों को पूजित करे । फिर ब्रह्माण्ड, स्वर्ण डिम्ब और ब्रह्मा, विष्णु महेश्वरों का पूजन करें । सागरों के सहित सातों द्वीपों का, मण्डल के सहित स्वर्ण द्वीप का, रत्नमय, पर्यंक के सहित रत्न स्तम्भ मण्डप के पञ्चानन का मध्य में अवश्य पूजन करे । 'ह्रीं' मन्त्र से हाथों को निबद्ध करके कूर्मपृष्ठ का यजन करे और पूर्व की ही भाँति उत्तम आसन को प्राप्त करके देवी का ध्यान करना चाहिए । हृदय के मध्य में पर्यंक से संभृत स्वर्ण द्वीप का चिन्तन करे । इसके अनन्तर देखते हुए की भाँति एकाग्र मन से देवी का स्मरण करे । हृदय में प्रत्यक्ष करके मानस उपचारों में अर्थात् मन में कल्पित उपचारों के द्वारा सोलह प्रकारों से हृदय में विराजमान देवी शिवा का भजन करना चाहिए । इसके अनन्तर हे भैरव! हाथ से विनियोग करने पर उस पुष्प से गन्धर्वों के द्वारा देवी का पूजन किया जाता और पूजकों के द्वारा फल की प्राप्ति नहीं की जाती है । इसके उपरान्त शिर के साथ गायत्री मन्त्र के द्वारा आवाहन करना चाहिए । हम महामाया का ज्ञान रखते हैं और चण्डिका नाम वाली का ध्यान करते हैं । इतना कहकर फिर जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे । हे देवि! आपके लिए 'ॐ ह्रीं श्री नमः' इस मन्त्र से देवि केलि में स्नानीय का समर्पण करे जो लक्षण लक्षित होवे, इसके अनन्तर मूल मन्त्र से दीपक के सहित गन्ध, पुष्प, धूप आदि को अर्पण करे और मोदक तथा पायस देवे । मिश्री, भुज, दधि, क्षीर, घृत और अनेक फलों से यजन करना चाहिए अर्थात् इनको अर्पित करना चाहिए । रक्तपुष्प, पुष्पों की माला, सुवर्ण और रजत (चाँदी) आदिक, उत्तम