कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २९९ नैवेद्य, देवी का लांगल, मोदक, सिता ( मिश्री ) शाण्डिल्य कर ताम्र नामक और कूष्माण्ड के फल, हरीत का फल, नारंगी, एलका ( इलायची ) और जो द्रव्य बाल प्रिय हो, कसेरु कविसादिक, नारियल फल का जल, ये सब देवी के लिए प्रयत्नपूर्वक समर्पित करे । देवी पूजा में सदैव लाल वर्ण का रेशमी वस्त्र समर्पित करे और नीला वस्त्र कभी भी नहीं देवे । देवी के परम प्रिय पुष्प जैसे वकुल पुष्प और केशर दे । माध्य, कल्हार, वज्र, करवीर, कुटङ्क, आक के पुष्प, शाल्मल, सुकोमल दूर्वा के अंकुर कुश मञ्जरिका, दर्भ, बन्धूक, कमल ये सभी पुष्पों में उत्तम हैं और पायस तथा मोदक द्रव्य हैं । बन्धूक के पुष्पों की अथवा बकुल के पुष्पों की माला, करवीर और माध्य पुष्पों को एक सहस्र संख्या में जो देवी को अर्पित किया करता है । देवी का कथन है कि वे अपने अभीष्ट कामनाओं की प्राप्ति करके मेरे लोक में आनन्द प्राप्त किया करता है । शीतल चन्दन जो कालीयक से संयुत होवे मुख्य अनुलेपन प्रयत्नपूर्वक देवी के लिए देना चाहिए । कपूर, कुंकुम, कूर्च, कस्तूरी, सुगन्धित, कालीयक में सुगन्धों में देवी को प्रीति करने वाले माने गए हैं । अंगराग जितने भी हैं उनमें देवी का परमाधिक प्रीति करने वाला सिंदूर है । मधु से संयुत सुगन्धिशाली से समुत्पन्न अन्न, अपूप, पायस, क्षीर ये पदार्थ देवी के लिए प्रशस्त हुआ करते हैं । कपूर के सहित रत्नोदक, पिण्डीतक, कुमारक रोचन, ये ही देवी के स्कानीय कहे गए हैं । दीपों में घृत का दीपक प्रशस्त कहा गया है । सब उपचारों को देकर मध्य में इनका पूजन करना चाहिए । अब उन देवियों के नाम बतलाये जाते हैं, कामेश्वरी, गुप्तदुर्गा, विन्ध्याचल की कन्दरा में निवास करने वाली, कोटेश्वरी दीपिका नाम वाली, प्रकटी, भुवनेश्वरी, आकाश गंगा, कामाख्या, दिक्करवासिनी मातंगी, ललिता, दुर्गा, भैरवी, सिद्धिदा, बलप्रथमनी, चण्डी, चण्डोग्र, चण्डनायिका, उग्रा, भीमा, शिवा, शांता, जयंती, कालिका, मंगला, भद्रकाली, शिवा, धात्री, कपालिनी, स्वाहा, स्वधामपर्णा, पंचपुष्पकरिणी, सब भूतों की दमनी, मन के प्रोत्साहन के करने वाली, ये चौंसठ