भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

३०४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ करने वाली मानी गयी हैं। साधक को तीन बार उस मुद्रा को दिखाना चाहिए और मूल मन्त्र को पढ़कर ही दिखावे। उस मुद्रा को शिव में न्यास करके फिर मण्डल में विन्यास करना चाहिए। ऐशानी दिशा में अग्रहस्त से जो द्वार पद्म से विवर्जित होवे। वहाँ पर साधक को 'ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र से चण्डी को नमस्कार करना चाहिए। 'रक्त चण्डायै नमः' इस मन्त्र से वहाँ पर निर्माल्य का क्षेपण करे। जल में अथवा किसी वृक्ष के मूल में निर्माल्य का भली भाँति त्याग करना चाहिए। इस रीति के विधान के साथ जो मनुष्य शिवा देवी का अभ्यर्चन किया करता है वह अविलम्ब ही अपनी कामनाओं की प्राप्ति कर लिया करता है जो भी कुछ सब उसके मन में विद्यमान होवें। सबसे प्रथम साधक आधा लाख जप करके विशेष रूप से पुरश्चरण करे जिसमें अनेक प्रकार के नैवेद्य आदि होवें। एक कुण्ड की मण्डल की ही भाँति ही रचना करे और अष्टमी तिथि में उपवास करना चाहिए। नवमी तिथि में जो कि शुक्ल पक्ष की होवे मनुष्य पाँच रजों के द्वारा गुरु और पिता सविधि में पूर्व की ही मण्डल की रचना करे। इसी विधान से चण्डिका देवी का यजन करना चाहिए। तीन सौ आठ बेलपत्रों के सहित तिलों से उसमें होम का समाचरण करे और तीन सहस्र जप करे। नैवेद्य-पुष्प गन्ध-वस्त्र अर्पित करे जो भी उनको प्रिय होवें। पूर्व में वर्जित तथा अन्य भी पायस आदि इसको समर्पित करे। पूजा के अन्त में उसके जातीय तीन बलि देनी चाहिए। सिन्दूर रत्न और जो-जो स्त्रियों के भूषण होवें अपनी शक्ति के अनुसार निवेदन करे और पुष्प तथा मालायें आदि निवेदित करना चाहिए। महा शक्तिशाली के अन्न के सहित और गाय के व्यंजनों से समन्वित घृतादि के द्वारा नवमी तिथि में देवी के लिए सम्पूर्ण बलि देनी चाहिए। गुरुदेव को दक्षिणा देवे उसमें स्वर्ण-गौ और तिल देवे। अभिशाप प्राप्त किए हुए, पुत्र रहित, अविद्या से मुक्त, क्रिया से हीन, अल्पज्ञ, वामन (बौना) गुरुनिन्दक, सदा मत्सरता से संयुक्त-ऐसे