कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंൠ श्रीकालिका पुराण ൠ ३०५ गुरु को मन्त्रों में वर्जित कर देना चाहिए । गुरु ही मन्त्र का मूल है और मूल को शुद्ध होने पर ही उससे जो भी उद्भूत है वह सफल होता है । इसी कारण से मन्त्र की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए । शठता, क्रोध, मोह अथवा असम्मति से गुरु के मुख से अथवा कल्पों में मन्त्र को देखकर अथवा छल से मन्त्र का ग्रहण करने पर मनुष्य मन्त्र की चोरी के पाप से तामिस्र नामक नरक में जाया करता है । तीन मन्वन्तर तक वह नरक में रहकर फिर पाप योनियों में समुत्पन्न हुआ करता है । शठ, क्रूर, मूर्ख, छद्म छल करने वाले और भक्ति से हीन में तथा दोषों से युक्त पुरुष को कभी भी मन्त्र नहीं देना चाहिए । जैसे सुन्दर बीज को जंगल में डाल दिया जाता है वैसा ही अनुपयुक्त मनुष्य को मन्त्र देना भी निष्फल ही होता है । एक लाख से पुरश्चरण पूर्वक कामना की साधना करनी चाहिए । क्योंकि पुरश्चरण से पापों का क्षय हुआ करता है । हे श्रेष्ठ नरो! दो लाख मन्त्र जप के द्वारा करे । प्रतिदिन तीनों सन्ध्याओं में और बीज संघात के द्वारा करके साधक मनुष्य कवि, वाग्मी पण्डित और यशस्वी हो जाया करता है । हे साधकों में श्रेष्ठ! इसके उपरांत पूजा के स्थान का श्रवण करो । जहाँ-जहाँ पर भी निर्जन स्थान में जे मनुष्य पूजा किया करता है । उसका देवी स्वयं ही पुत्र-पुष्प और फल का तथा जल का आदान किया करती है । पूजा में शिला प्रशस्त होती है तथा स्थण्डिल और निर्जन होना चाहिए । उपांशु जप सभी जपों में उत्तम कहा गया है । अशुचि की दशा में कभी भी महामाया का पूजन नहीं करना चाहिए । जो अत्यन्त भक्ति से युक्त नर हो उसे मन्त्र का स्मरण अवश्य ही करना चाहिए । दाँतों में रक्त किसी भी स्मरण से समुत्पन्न हो जाने पर स्मरण भी नहीं किया करता है जानु के ऊर्ध्व भाग में क्षतज उत्पन्न हो जाने पर नित्य कर्म का भी समाचरण नहीं करना चाहिए । उसके नीचे के भाग में यदि रक्त का स्नान हो जावे तो नैमित्तक कर्म न करे । सूतक में समुत्पन्न होने पर, क्षौर कर्म में, मैथुन में, धूमोद्गार में, वन्ति हो जाने पर नित्य कर्मों का त्याग कर देना चाहिए । द्रव्य के मुक्त होने पर अजीर्ण में और कुछ भी न खाकर