कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें8002 श्रीकालिका पुराण 8002 ३९५ उसका वह दीप स्पर्शन मात्र से ही सुभग हो जाता है । पतंग कीट-केश आदि के दाह से, कन्याद से संहत, वसा, मज्जा, अस्ति सम्पूति जो यज्ञादि में उपयोजन हैं ऐसे अज्ञात रूप वाला सभी दोष स्पर्श से ही विनाश को प्राप्त हो जाया करता है । नारसिंह मन्त्र के द्वारा देवतीर्थ से संस्पर्श करे । याजक को चाहिए कि घट के मध्य मैं स्थित जल को देखते हुए अभ्युक्षण करे । बांये हाथ से पकड़ कर उस समय में वाम पार्श्व में स्थित पात्र को आधार मन्त्र के द्वारा संस्कार करता हुआ जल का संस्पर्श करना चाहिए । यहाँ पर यज्ञ दान से अपेय आदि का संसृष्टि संगता है । शव के स्पर्श से जलाशय और स्नान से संगत जल से दूषण सब देव पूजन में विष्ट हो जाया करते हैं । चन्द्रार्थ बिन्दु से रहित यह नारसिंह मन्त्र है । अपनी संज्ञादि का अक्षर जो बिन्दु और चन्द्रार्द्ध से परियोजित होवे । इसको कार्य की सिद्धि के लिए आधार मन्त्र साधक जान लेवे । फिर आधार मन्त्र के द्वारा अपने आसन को हाथों से लाकर और रखकर शीघ्र ही पाणि में संस्पर्श करे । उस समय में उस श्रेष्ठ आसन पर आत्मा मन्त्र के द्वारा उपवेशन करे । पूर्व में सोम से समन्वित स्वाक्षर के समाहूत करके साधक को बिन्दु के सहित आत्मा मन्त्र जानना चाहिए । इसके अनन्तर नाद बिन्दु से समन्वित मातृका न्यास करे । विचक्षण पुरुष को अपने शरीर में मातृका के मन्त्रों के द्वारा न्यास करना चाहिए । जो भी दुष्ट हो तथा स्पष्ट हो और मात्राओं के भ्रष्ट आदि का दोष होवे न्यास किए हुए मातृका के मन्त्र साथ ही उनका नाश कर दिया करते हैं । समस्त व्यंजन तथा विष्णु आदि स्वर ये सभी मातृका के मन्त्र है जो कि चन्द्रबिन्दु के विभूषण वाले हैं । सब युगान्त स्वयं बन्धों के न्यस्त होने पर न्यूनता की पूर्ति है । विन्यास की हुई मातृका स्वयं ही मन्त्र में और कल्प में न्यूनता की पूर्ति कर देती है । जिसमें एक मात्रा हो तो वह ह्रस्व होता है मात्रा का अर्थ कम से कम समय होता है । दो मात्राओं वाला स्वर दीर्घ कहा जाता है । तीन मात्राओं वाला या दो से अधिक मात्राओं वाला स्वर प्लुत जानना चाहिए । वर्ण इसी प्रकार से व्यवस्थित होते हैं ।