कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ आचमन करके, शुचिता को प्राप्त हुआ, सुन्दर रीति से स्नान किया हुआ देव पूजा में स्थित होवे । पूजा की वेदी से बाहर स्थित होकर बुद्धि से चार हाथों के अन्तर में स्थित रहे । घर में अथवा द्वार देश में स्थित होता हुआ शिर से गुरु को प्रणाम करे अपने इष्टदेव को इसी भाँति प्रणाम करना चाहिए तथा चित्त के ही द्वारा दिक्पालों को प्रणाम करना चाहिए । जो पाप में अथवा पूर्वकाल में अर्जित किया है उन दिनों में अथवा अन्य किसी दिन में प्रायश्चितों के द्वारा अपनुन्न नहीं किया गया है उस पाप का बुद्धि के द्वारा स्मरण करना चाहिए । उस पाप के अपनोदन करने के लिए दो मन्त्रों का उच्चारण करे । हे देवि! जो कि एक प्राकृत चित्त है पाप से आक्रांत हो गया था आप मेरे चित्त से आप पाप को निकाल दो, हूँ फट् आपके लिए नमस्कार है । पाप पुण्य के कुछ देव प्रत्यक्षा देखने वाले हैं उनमें सूर्य, सोम, यम, काल, और पाँच महाभूत ये नौ हैं । ये शुभ और कर्म के नौ देव साक्षी होते हैं । इसके अनन्तर 'हूँ फट्' इसके पार्श्व में, ऊर्ध्व में और अधोभाग में आत्मा को क्रोध की दृष्टि से निरीक्षण करके सुनना चाहिए । ऐसा करने पर प्रथम से पापों के उत्सारण कर्म किए जाने पर जो भी दृढ़त्तर पाप होता है वह दूर ही स्थित रहा करता है । पूजन के अतीत होने पर जो अपने स्थान को पुनः प्रणाम करता है तो जो भी अल्पतर पाप हो वह नाश को प्राप्त हो जाया करता है । ॐ अः फट्, इस मन्त्र के द्वारा पूजा की वेदी से वह प्रवेश करे । पूजन में पापों के त्याग कर देने वाले की जो भी अभीष्ट कामना है वह क्षण भर में पूरी हो जाया करती है । पुष्प, नैवेद्य, गन्ध प्रभृति 'ह्रीं हूँ फट्' मन्त्र से जो अपने द्वारा अवज्ञात न होवें भली भाँति से पुष्प आदि का दूषण, स्पर्श न करने के योग्य का स्पर्श, जो अन्याय से अर्जित होवे तथा निर्माल्य में संतुष्ट में जो कीट आदि का आरोहरण हो वह सभी नाश को प्राप्त हो जाता है । नैवेद्य आदि के अवलोकन से फिर 'रम्', इस मन्त्र से दीप की शिखा का संस्पर्श करना चाहिए ।