कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२२ श्रीकालिका पुराण
करके अन्तर सहित निरन्तर नीचे की ओर नमित करते हुए पूजक को करना चाहिए । गणेश के बीज से उससे अवतरित होओ, यह कहे । अभीष्ट देवों के अवलम्बन के लिए दो बार उच्चारण करे । नासिका की वायु निःसारण से देवता आकाश में स्थित हो जाते हैं । इस प्रकार से करने पर उसी स्थिति मण्डल में हो जाया करती है । स्वान्तः अंशु और बिन्दु से बीज कहा जाया करता है । यह विघ्नों के बीजों का विनाश करने वाला है और धर्म, कर्म काम साधने वाला है । गन्ध पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और जो भी अन्य वस्तु दी जाती है तथा वस्त्र और अलंकार आदि उनका देवता उच्चारण करके प्रोक्षण तथा पूजन करे । मूल मन्त्र से उत्सर्जन करके प्रतिनाम से निवेदन करना चाहिए । वरुण के बीज के द्वारा उनका प्रोक्षण करे । इष्ट मूल मन्त्र के द्वारा उसी भाँति उत्सर्ग और निवेदन करे । ऊपर चन्द्र और बिन्दु से वरुण और बीज कहा जाता है । विलोकन, पूरक तथा पृथक्-पृथक् दान-जप कर्म माला की प्रतिपत्ति यह तीन हैं । अपने इष्ट मन्त्र के द्वारा माला का प्रोक्षण कीर्तिक किया गया है । पहले गाठापत बीज का उच्चारण करके इसके अनन्तर ही करना चाहिए । हे माला! आप अविघ्न करे, इसी मन्त्र के द्वारा माला का ग्रहण करे । जप के अन्त में माला का न्यास शिर पर करे, ऐसा कहा गया है । हाथों से माला लेकर श्री बीज के द्वारा उसी भाँति अर्चना करनी चाहिए । अन्त्य दन्त्यान्य मात्राओं आदि वर्ग और तृतीय पर से पर के पूर्व में श्री बीज बिन्दु से इन्दु से माला का अवतार शिर से सदा किया जाता है । उसके हाथों से आदान करके सारस्वत से श्री बीजों का आद्य-आद्य बिन्दु चन्द्रार्ध से संयुत, यह चार बीज सारस्वत कहे जाते हैं । पौराणिकों और वैदिकों द्वारा और मूल मन्त्र के द्वारा करे । प्रदक्षिणा और प्रणाम करे जो धर्म व अर्थ का साधक है । भूमि का वीक्षण करके तथा उसका अध्युक्षण करके पूर्व से क्षिति बीज के द्वारा उस भूमि का शिर से स्पर्श करता हुआ अपने इष्ट देवताओं को प्रणिपात