कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ३२१ से ऊपर में अनन्त है और उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है । अनन्त के शरीर से संयुक्त एक नाल है जो पाताल तक गोचर होता है । पृथ्वी के मध्य में एक पद्म स्थित है जिसके दल दिशायें हैं और गिरि उसका केशर हैं । उसके आठ दिशाओं में दिक्पाल है और मध्यभाग में स्वर्ग अवस्थित है । उस पद्म की कर्णिका में ब्रह्मलोक है । उसके नीचे भाग में महालोक आदि हैं । स्वर्ग में ज्योतिर्मणि हैं और देवगण हैं । उनके अनन्तर में चारों वेद हैं । रज, सत्व, तम ये तीन गुण हैं जो प्रकृति से समुद्गत हैं । ये सदा ही पद्म के मध्य में स्थित है और परतत्व हैं । वहाँ पर आत्मा संस्थित है । जो ऊर्ध्वछेदन है, जो ऊपर की ओर है । अधः छेदन है जो नीचे की ओर है वहाँ पर केशर के अग्रभाग में पुनः स्थित है । इसके अनन्तर सूर्य, अग्नि, चन्द्र और मरुत के मण्डल क्रम से है । योग पीठ में शिव का आसन है और इसके परे में सुखासन है फिर आराध्य आसन है इसके पर में विमलासन है । मध्य में सम्पूर्ण इस चराचर जगत् का विशेष चिंतन करना चाहिए । वहाँ पर तीन भागों में विनिश्चित हुए ब्रह्मा, विष्णु और शिव का चिन्तन करना चाहिए । वहाँ पर अभ्यर्थना करने में समुपस्थित अपने आपका चिंतन करे । मण्डल, योगपीठ और पद्म का चिन्तन करना चाहिए । शव आदि चारों आसनों का भी यहाँ पर चिन्तन करे । इसके उपरान्त योगपीठ का ध्यान करके मण्डल के साथ एकता पुनः ध्यान करे । पीछे आसन का यजन करे । योगपीठ के ध्यान के द्वारा जो जिस प्रकार से जल दिया जाता है और नैवेद्य, पुष्प, धूप आदि स्वयं ही वहां पर उपस्थित हो जाया करते हैं । योगपीठ के पूजन में गन्धर्वों के सहित सब देवगण और चर, सचर, गुह्यक सभी चिन्तित और पूजित हो जाया करते हैं । अपने अभीष्ट देवता के पूजन बिना जिसके विचिन्तन से चतुर्वर्ग का लाभ उपासक किया करता है और उसकी तुष्टि एवं पुष्टि हो जाती है । आवाहन के अनन्तर ही दोनों करों के द्वारा अवतारित करना चाहिए । पहले दोनों करों को ऊँचा करे और ऊपर की ओर उत्क्षिप्त