कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ जो भी मल है वह भी शुद्ध हो जाता है। ग्रह में यदि देव या यजन करे तो उस समय में उसका विलोकन करना चाहिए और आदित्य बीज के द्वारा क्रम से चारों पाश्र्वों में करे। हान्त समाप्ति से सहित और वह्नि बीज से संहित होवे । चतुर्थ के सहित उपान्त वह सकल आगे हो, यही आदित्य बीज कहा गया है जो कि समस्त रोगों का विनाश करने वाला है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कारण है और सन्तोष देने वाला है । किसी अशुद्ध पक्षी का संयोग, पक्षी की विष्ठा का प्रसेचन तथा मूषिकाओं का स्पर्श एवं कृमि और कीट आदि का संगम आदि दोष नष्ट हो जाया करते हैं अवलोकन करने मात्र से ही इनका विनाश होता है और गृह दूषण नष्ट हो जाया करता है । इसके अनन्तर प्रथम योगपीठ का ध्यान का समाचरण करना चाहिए । योगपीठ का ध्यान मात्र ही पर्याप्त है। इसी से योगपीठ मण्डल में प्रवेश किया करता है । योगपीठ के स्मरण करने पर सब कुछ योगपीठ से परिपूर्ण सम हो जाता है । योगपीठ से परमोत्तम कोई आसन नहीं हुआ करता है जिसके ध्यान से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है जिसमें जड़-चेतन मनुष्य सभी हैं। उसके चिन्तन का बड़ा भारी महात्म्य है जिसके कहने का उत्साह कौन कर सकता है ! उसके चिन्तन भर से ही देखो मनुष्यों के शोक विनाश हो जाया करता है । योगपीठ के धारण करने से तो चतुर्वर्ग के फल का वह प्रदायक होता है । अब उसके ध्यान एवं चिन्तन का प्रकार बतलाया जाता है, वह विशुद्ध स्फटिक मणि के सदृश है, चतुष्कोण है और चार वृत्तियों वाला है । आधारशक्ति से विदित प्रग्रह वाला है तथा सूर्य के समान है । आग्नेय आदि चारों कोनों में क्रम से सदा ही धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य स्थित रहा करते हैं । पूर्व आदि दिशाओं में यह निम्नलिखित क्रम से स्थिति करते हैं । अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य, अवैराग्य, हैं इससे धारणार्थ व्यवस्थित हैं। उसके ऊपर जल का समुदाय है। उसमें ब्रह्माण्ड अवस्थित हैं, उस ब्रह्माण्ड के भीतर जल है। उसके ऊपर यह पृथ्वी स्थित है। उस कूर्म