कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३१९ में बताऊँगा जो कि कुण्डली की शक्ति है । जो अभेद से कही जाती है । मार्जक इस मन्त्र के द्वारा भूतों का अपसारण करे इसके करने पर स्थानभूत जो है वे सुरार्चन के समय में दूर चले जाया करते हैं । भूतों के वहाँ पर स्थित रहने पर सदा ही वे लुब्धक नैवेद्य मण्डल को विशेष रूप से लुप्त कर दिया करते हैं और देवता उसका ग्रहण नहीं किया करते हैं । इस कारण से यत्नपूर्वक भूतों का अपसारण करना ही चाहिए । वह अपसारण अस्त्र मंत्र के सहित ही करे । उसका मन्त्र यह कहा गया है । वे भूत इस भूमि के पालक होवें । मैं भूतों के अविरोधक के द्वारा ही पूजा कर्म कर रहा हूँ । साधक इसके द्वारा स्थण्डिल से भूतों को अपसारित करके इसके पश्चात् दिग्बन्धन में मन्त्र स्थित होता है । अपनी आत्मा के पूजन के द्वारा ही कर्म के आरम्भ करने की अधिकारिता प्राप्त हुआ करती है और पूजित आसन योगपीठ के सदृश हो जाया करता है । यह पाँचों भूतों के स्वरूप वाले वपु स्वाभाविक रूप से सदा ही अशुद्ध होता है । यह मल की पूर्ति से समायुक्त है और श्लेष्मा, विष्ठा, मूत्र, इनसे पिच्छल रहा करती है, यह शरीर अपरिष्कृत रहा करता है । इस शरीर के बीजभूत ये पाँच महाभूत होते हैं । उन समस्त भूतों को जो देह की संङ्गी हैं और बीज हैं । जो वायु, तेज, पृथ्वी, जल और आकाश है इनकी वृद्धि के लिए क्रम से शोषण, दहन, भस्म, प्रोत्साह, अमृतवर्षण और आप्लवन करना चाहिए जो कि चिंता मोक्ष की विशुद्धि के लिए है । अण्ड के चिंतन से, भेद से उसके मध्य में देव का चिंतन से, स्वकीय इष्टदेव की चिन्ता सर्वात्मा रूप से होती है जो कि आत्मा को हो जाती है । मैं देव हूँ, ऐसा संस्कार हो जाता है । इसके अनन्तर जो नैवेद्य और पुष्प गन्ध आदिक है और भी पूजा के उपकरण के लिए है यहाँ पर देवत्व हो जाता है । देव आधार है, मैं देव हूँ, देव के लिए योजित करें । सबको देवता की सृष्टि से शुद्धता भी समुत्पन्न हो जाया करती है । मन और जीवात्मा की शुद्धि प्राणायाम से हुआ करती है । अन्तर्गत