भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 442 में से

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पृष्ठ 325

३२८ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵ भगवान् पुरुषोत्तम की सन्निधि में हुआ करती है । उससे भी दुगुने फल की देने विशेष रूप से द्वारका में कही है । समस्त क्षेत्रों में और तीर्थों में की हुई पूजा द्वारावती की पूजा के ही समान हुआ करती है । विंध्याचल में की हुई पूजा सौगुनी फलदायिका होती है, ऐसा कहा गया है और गंगा में भी की गई पूजा उसी के समान होती है । आर्यावर्त्त, मध्यदेश, ब्रह्मवर्त्त तथा पुष्कर में करतोया नाम की नदी के जल में उससे भी चौगुनी फल देने वाली कही गई है । हे भैरव! उससे भी चौगुने फल देने वाली पूजा नन्दि कुण्ड में होती है । उसमें भी चौगुनी जाल्पिपेश्वर की सन्निधि में की हुई बतलायी हुई है । वहाँ पर सिद्धेश्वरि की योनि में की गई पूजा उससे भी दुगुनी बताई गई है । उससे भी चौगुने फल को देने वाली लौहित्य नदी के जल में कही गई है । उसी के समान कामरूप देश में सभी जगह जल और स्थल में मानी गई है । जैसे सबसे श्रेष्ठ भगवान् विष्णु हैं तथा लक्ष्मी सबसे उत्तम है । कामरूप में सुरालय में देवी की पूजा प्रशस्त होती है । देवी का क्षेत्र कामरूप देश है और अन्यत्र उसके समान है अन्य स्थल में देवी विरल ही हुआ करती है और कामरूप में तो घर-घर में ही विद्यमान रहती है । इससे भी सौ गुने महत्व वाली पूजा नीलकूट पर्वत के शिखर पर होती है । उससे भी दुगुने शिवलिंग में की गई पूजा फलदायिनी होती है । उससे भी दुगुनी फलदायिनी शैल पुत्र्यादि की योनियों में कही गई हैं । उससे भी सौ गुनी अधिक महत्व वाली पूजा कामाख्या देवी की योनि मण्डल में बतलाई गई है । कामाख्या में महामाया की पूजा को एक बार कर चुका है वह इस लोक में कामनाओं को प्राप्त करता है और परलोक में भगवान् शिव की स्वरूपता का लाभ किया करता है । उस पुरुष के समान अन्य कोई भी भाग्यशाली नहीं है और फिर उसका कोई भी कृत्य शेष नहीं रह जाता है । वह पुरुष अपना मनोवांछित अर्थ इस लोक में प्राप्त करके चिरायु हो जाता है । उसकी गति वायु के ही समान हो जाती है जो अन्यों के द्वारा कभी भी बाधित नहीं हुआ करती

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