कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें௰ श्रीकालिका पुराण ௰ ३२९ है । वह पुरुष संग्राम अथवा शास्त्रावाद में दुर्जय हो जाता है । वैष्णवी तन्त्र के द्वारा कामाख्या के योनि मण्डल में एक बार अभ्यर्चन करके उसका सौ गुना फल का लाभ किया करता है । मूलमूर्ति महामाया योगनिद्रा जगन्मयी है उसका वैष्णवी तन्त्र पहले ही प्रतिपादित कर दिया गया है । अन्य जो मूर्तियाँ कही गई है जो शैलपुत्री आदि दूसरी हैं वे सब उसी के विभाग हैं और उसके ही शरीर से निर्गत हुई हैं । जिस रीति से नित्य ही सूर्य के बिम्ब से किरणें निःसकरण किया करती हैं ठीक उसी भाँति देवी महामाया के शरीर से उग्रचण्डा आदि निकला करती हैं । मेरे द्वारा आपको उन्हीं के अंगरूप कहने चाहिए महामाया का स्वरूप तो एक ही है और कार्यों के सम्पादन करने के लिए वही भिन्नता को प्राप्त हुई हैं । कामाख्या तो महामाया है और मूलमूर्ति गान ही गाया जाया करता है । वह पीठों के द्वारा विभिन्न नामों वाली होकर महामाया गायी जाया करती है । जिस प्रकार से एक ही भगवान् विष्णु नित्य होने से सनातन हैं । जनों के पीड़ा को दूर करने से वही प्रभु जनार्दन, इन नाम से कहे गए हैं । ठीक उसी भाँति महामाया कामार्थ गिरि में संगत हुई थी उसी समय यह महादेवी के द्वारा और नरों के द्वारा निरन्तर कामाख्या कही जाती है । जैसे कोई पुरुष छत्र के ग्रहण करने से छत्री हो जाया करता है और स्नान काल में स्नापक कहा जाता है ठीक उसी रीति से नाम से यह कामाख्या हो गई है । महामाया का शरीर के लिए समुपस्थित हुआ था । लोहित, कुकर्मों से पीत जो कामार्थ उपयोजित किए गए हैं । कामकाल में खंड का परित्याग करके वह स्वयं ही स्त्रक् को ग्रहण किया करती है । जिस समय वह काम को त्याग कर देने वाली होती है उस समय में वह असिधारिणी होती है । लोहित पंकज को न्यस्त करने वाले शिव प्रेम कामकाल में सित प्रेत के ऊपर संस्थित काम को परित्यक्त कर देने वाली रमण करती है । उसी भाँति इधर-उधर गमन करके सिंह के ऊपर विराजमान होती हुई कामदा हो जाती है । किसी समय तो वह सित प्रेत पर होती है और