कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३० [ornament] श्रीकालिका पुराण [ornament] ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ किसी समय में रक्त पंकज पर स्थित होती हैं । किसी अवसर पर वह केशरी के पीठ पर संस्थित होती हुई कामरूप वाली रमण किया करती है । जिस अवसर पर वह लोहित पद्म पर संस्थित हुआ करती है तो उस समय उसके आगे केशरी चरण किया करता है । जिस समय प्रेत पर स्थित देवी होती है उस समय आगे अन्य का निरीक्षण किया करती है । जिस समय वह महामाया के स्वरूप से वह वरदा होती है उस समय पूजा के काल में प्रेत, पद्म और सिंह के ऊपर स्थित होती है । जिस अवसर पर रक्त पद्म में ध्यान करे तब आगे हरि का चिन्तन करना चाहिए । जब हरि में ध्यान करे तब अन्य दो आगे चिन्तन करे । एक ही स्थान तीनों के ध्यान करने पर प्रेत पद्म हरि में क्रम से करना चाहिए । उन पर कामदा देवी के स्थित होने पर कामदा हरि में क्रम से करना चाहिए । एक-एक पर भी जैसे भी उसी भाँति शिवा का चिन्तन करे । वह एक समस्त जगतों की प्रकृति जहाँ-तहाँ ब्रह्मा, विष्णु, देवों के द्वारा वह जगन्मयी धारण की जाया करती है । सित प्रेत महादेव हैं, ब्रह्मा लोहितपद्म हैं, हरि हरि हैं ऐसे ही महान् ओज वाले के वाहन जानने चाहिए । क्योंकि अपनी मूर्ति से उनका वाहन होना युक्त नहीं होता है । इसी कारण से अन्य मूर्ति करके तीनों वाहनता को प्राप्त हुए हैं । जिस-जिस में महामाया शिव निरन्तर प्रसन्न होती हैं उसी-उसी रूप से तीनों ही आसन हुए थे । सिंह के ऊपर रक्त पद्म स्थिति है, उसके ऊर्ध्व में गत शिव हैं । उनके ऊपर वह वर देने वाली अभय दायिनी महामाया है । इस प्रकार के स्वरूप से ध्यान करके निरन्तर शिव का पूजन करना चाहिए । उससे ब्रह्मा, विष्णु और शिव बिना ही संशय के पूजित हो जाते हैं । इस प्रकार से सदा कामाख्या एक रूप वाली महामाया ध्यान से और रूप से भिन्न है इससे वहाँ पर उसका पूजन करना चाहिए । इस प्रकार से दुर्गा के विशेष तन्त्रों को आप दोनों को कह दिए हैं । हे परमश्रेष्ठों! अब उसके अंग मन्त्रों का आप श्रवण करिए ।