भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 442 में से

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पृष्ठ 328

३३२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ मृणाल के सदृश आयत स्पर्श वाली दश बाहुओं से युक्त है । दाहिने हाथ में त्रिशूल, देव, खड्ग, चक्र क्रम से नीचे की ओर हैं । बाहुओं के संघों में तीक्ष्ण बाण तथा शक्ति से संगत है । ऊपर की ओर खेटक, पूर्ण, चाप, पाश और अंकुश धारण किए हुए हैं । नीचे की ओर बिना शिर वाले महिष असुर को प्रदर्शित करना चाहिए । जिसका शिर छिन्न हो गया है और जो दानव अपने हाथ में खण्ड लिए हुए हैं । जो हृदय में बल से विद्ध हो रहा है और जिसकी अँतड़ियाँ बाहर निकल रही हैं । स्रवित होते हुए रक्त से जिसके अंग रुधिर प्लावित हो रहे हैं और जो रक्त से विस्फुरित नेत्रों वाला हो रहा है । जो नागपाश से वेष्टित है और जो क्रोधावेश के कारण कुटिल भौंहों से समन्वित मुख वाला है । जो पाश के सहित बाँये हाथ से दुर्गा के द्वारा मस्तक के केश पकड़ा हुआ है । जिसमें मुख से रुधिर प्रवाहित हो रहा है ऐसी देवी के सिंह का भी प्रदर्शन करना चाहिए । देवी का दाहिना चरण सिंह के ऊपर संस्थित है तथा कुछ ऊपर की ओर वाम चरण का अंगुष्ठ महिषासुर पर स्थित है । इस प्रकार के ध्यान को करते हुए फिर देवी का ध्यान करे जो उग्र चण्डा, प्रचण्डा, चण्डोग्रा, चण्डनायिका, चण्डा, चण्डवती, चामुण्डा चण्डिका है । इन आठ शक्तियों से निरन्तर परिवेष्टित है । इसी रीति से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली देवी का निरन्तर चिन्तन करना चाहिए । इसका एक मन होकर श्रवण करो । यह धर्म काम और अर्थ का साधन है । इसका अंग मन्त्र दुर्गा तन्त्र, यह श्रुत किया गया है । सूर्य के मकर राशि पर स्थित होने पर जो शुक्ल पक्ष की पंचमी होती है । उसमें इस तन्त्र के द्वारा विधि-विधान के साथ शिवा का भली भाँति पूजन करके फिर शुक्ल पक्ष की अष्टमी में यथाविधि देवी का पूजन करके नवमी तिथि में बहुत बलिदानों का समाचरण करना चाहिए और सन्ध्या के समय में अपने शरीर से उक्षित रुधिर की बलि करनी चाहिए । उस प्रकार से करने पर कल्याणों से युक्त होता हुआ पुरुष नित्य ही प्रमुदित होता है ।