कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३३७
[Main Text] समस्त भक्ष्य भोज्य आदि से, माँस ओदन से, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र-भूषण से भवानी का साधक यजन करे । हे भैरव! नर और नर्तकों के समुदाय तथा वेश्याओं के द्वारा देवी का मनोविनोद करे । नृत्य और गीतों से समुदित होकर रात्रि में जागरण करे । द्विजातियों के साथ और ज्ञानियों को तथा ब्राह्मणों को भोजन करावे । पवित्रारोपण के हो जाने पर दक्षिणा का उपदायन करे । दक्षिणा में सुवर्ण, गौ, तिल, घृत, वस्त्र अथवा शाक ही देवे । इसके अनन्तर साधक इस मन्त्र का उच्चारण करे, हे परमेश्वरि! मणि, विद्रुम की मालाओं से और मन्धर के कुसुम आदि के द्वारा आपकी यह साम्वत्सरी पूजा सम्पन्न होवे । इसके उपरान्त पूजाओं से और प्रतिपत्तियों के द्वारा देवी का विसर्जन करना चाहिए । इस रीति से देवी को यथाविधि पवित्राओं के दान के हो जाने पर सम्वत्सर की जो पूजा है वह वासर से सम्पूर्ण हो जाया करती है । वह मनुष्य सैंकड़ों करोड़ कल्पों में देवी के ही घर में निवास किया करता है और वहाँ पर भी उसको सुख, सौभाग्य की अतुल समृद्धि होती है ।
[Section Header] महिषासुर उपाख्यान
श्री भगवान् ने कहा-दुर्गा तन्त्र से मन्त्र के द्वारा दुर्गा का महोत्सव करना चाहिए । शरद् काल में महानवमी को राजास आदि का बलिदान करना चाहिए । आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में जो अष्टमी तिथि होती है, वह महाअष्टमी कही गई है जो देवी की परम प्रीति करने वाली हुआ करती है । इसके पश्चात् जो नवमी तिथि होती है वह महानवमी कही गई है । वह समस्त लोकों की पूजनीय और शिव की होती है । हे भैरव! हे वत्स! इन दोनों में जो पूजा होती है उसमें जो कुछ भी विशेषता है उसका आप श्रवण करिए । मण्डल में विधि के साथ देवी का प्रयत्त होकर मनुष्य भली भाँति पूजा करे । हे भैरव! वैष्णवी तन्त्र से मन्त्र के द्वारा और दुर्गा के मन्त्र से मूर्ति भेद में जैसे देवी भूति के लिए पूजा का ग्रहण किया करती है । कन्या राशि पर सूर्य के आ जाने