कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३४३ का अत्यन्त विध्वंस किया जा रहा है। इस प्रकार से प्रकोप करते हुए उन शरीरों से पृथक्-पृथक् तेज निर्वात हुए जो उसी क्षण शक्ति के स्वरूप वाले थे। उन देवों के शरीरों से निःसृत तेजों से देवी ने वपु धारण किया था और निश्चय ही कात्यायन के द्वारा सन्धुक्षित एवं पूजित हुई थी। इसी से वह कात्यायनी, इस नाम से कही गई है। इसके अनन्तर उसी मन्त्र के द्वारा जो दश बाहुओं से समन्वित है उस जगतों की धात्री और जगन्मयी देवी ने पश्चात् महिषासुर का वध कर दिया था। जिस अवसर पर महादेवी का संस्तवन किया गया था और शोधित की गई थी तो आश्विन मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि में वह जगन्मयी प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई थी। वह देवों के तेजों की मूर्ति परम शोभन शुक्लपक्ष में सप्तमी तिथि में उसने किया था और वह देवी अष्टमी में उन्हीं के द्वारा पूजित थीं और उसने महिषासुर का हनन किया था। दशमी में विदा की गई थी और शिवा अन्तर्धान हो गई थी। मार्कण्डेय ने महर्षि से कहा-राजा सागर ने इस देवी की संगति का श्रवण करके वह उसके स्वरूप में संशयालु होकर पुनः उसने और्व से पूछा था। राजा सागर ने कहा-यदि महादेवी ने पीछे महिषासुर का हनन किया था तो पूर्व में कैसे महिषासुर के लिए वह भद्रकाली के रूप वाली हुई थी। उसी भाँति उसका दर्शन है कि उसके चरणों से समाक्रांत किया गया था कि उस असुर के हृदय में शूल गड़ा हुआ है और हृदय निर्भिन्न हो रहा है। हे मुनि श्रेष्ठ! मुझे यह बड़ा संशय हो रहा है इसका छेदन कृपा कर करिए। और्व मुनि ने कहा-हे नृप शार्दूल! आप श्रवण करिए, जिस तरह पहले भद्रकाली प्रादुर्भूत हुई थी। वह महामाया महिषासुर के साथ ही थी। यह महिषासुर ही है जो पर्वत में निद्रा में वर्तमान था। उस वीर ने एक घोर दर्शन वाला स्वप्न देखा था। उसने यह स्वप्न देखा था कि मुँह फैलाए हुए अत्यन्त भीषण महामाया भद्रकाली ने खंड से मेरे शिर का छेदन करके उसके रुधिर का पान कर रही थी। उस समय महिषासुर के द्वारा भली भाँति आराधना की हुई देवी भद्रकाली सोलह