कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 341, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंभुजाओं से युक्त होकर प्रादुर्भूत हुई थी अर्थात् प्रत्यक्ष रूप में प्रकट हुई थी । इसके अनन्तर महिषासुर ने जगन्मयी महामाया को प्रणाम किया और अत्यन्त विनम्र मूर्ति वाला होकर भक्ति की भावना से परिपूर्ण होते हुए उस असुर ने यह वचन कहा । महिष बोला-हे देवी! आपके खंड से मेरे मस्तक को काटकर मेरे रुधिर को आपने पिया था और मैंने यह स्वप्न देखा है । स्वप्न के द्वारा निश्चित रूप से मैंने अवलोकन किया है । आपके द्वारा यह अवश्य ही करना है, यह मैंने ज्ञान प्राप्त कर लिया है । यह मेरे रुधिर का पान आप अवश्य ही करेंगीं । अब उसमें मुझे एक वरदान दीजिए । हे परमेश्वरि! मैं तुम्हारे द्वारा ही वध करने के योग्य हूँ । इसमें कुछ भी संशय नहीं है । मुझे भी इस विषय में कोई दुःख नहीं है क्योंकि जो नियत है वह किसी के भी द्वारा लंघित नहीं हुआ करता है अर्थात् उसे कोई टाल नहीं सकता है । किन्तु पहले समय में आपके ही साथ मैंने भगवान् शम्भु की आराधना की । मैंने भी शम्भु का समाराधना किया था और उसी भाँति की चेष्टायें प्राप्त हुई थीं । जब तक तीन मनवन्तर हैं, उत्तम असुर राज्य है । मैंने उस राज्य को अकण्टक रूप से भोग किया है । मुझे इसका कुछ भी अनुमान नहीं है । शिष्य के कारण से कात्यायन मुनि के द्वारा मुझे शाप दिया गया था । यह सीमान्तिनी तेरा विनाश करेगी, इसमें संशय नहीं है । पुराने समय में तपश्चर्या करते हुए परम श्रेष्ठ रौद्राशव नामक जो कात्यायन मुनि के शिष्य को हिमवान् के समीप में एक अनुपम स्त्री का रूप धारण करके मैंने कौतुक से मोहित किया था । विप्र ने उस अवसर पर तप का त्याग कर दिया था । पाप में ही संस्थित कात्यायन के पुत्र ने मुझे शाप दिया । उस समय में माया का ज्ञान प्राप्त करके शिष्य के लिए क्रोध की अग्नि के द्वारा मुझे शाप दिया गया था क्योंकि तुमने यह मेरा शिष्य मोहित किया है जो तप से च्युत हो गया है । तूने स्त्री के स्वरूप के द्वारा ऐसा किया है इसलिए तुझको स्त्री ही मारेगी । इस रीति से पूर्व में कात्यायन मुनि ने स्वयं मुझको शाप दिया था । उस शाप का काल