भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 442 में से

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अब आकर उपस्थित हो गया है । मैंने देवों के इन्द्र का पद प्राप्त किया था और तीनों भुवनों का समान उपभोग किया था । मुझे कुछ भी सोचने अर्थात् शोक और चिन्ता करने के योग्य नहीं है और न मुझे शेष जो भी प्रार्थना करने योग्य है जो देवि! हे दुर्गे! मुझे दीजिए । आपकी सेवा में मेरा बारम्बार नमस्कार है । देवी ने कहा--हे महासुर! जो मुझे वरदान प्रार्थना करने के लायक हैं उसके विषय में तुम अब श्रवण करो । तुम्हारा प्रार्थनीय जो वर है उसको दे दूँगी, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । महर्षि ने कहा-मैं आपकी प्रसन्नता से यज्ञ के भाग का उपभोग करना चाहता हूँ । जिस रीति से सभी यज्ञों में पूज्य हो जाऊँ वैसा ही आप मुझ पर दीजिए । जब तक भी संसार में सूर्यदेव विद्यमान है मैं आपके चरणों की सेवा का परित्याग नहीं करूँगा । यदि आपके द्वारा मुझे वरदान देना है तो इस प्रकार से ये दो वर मुझे देने की कृपा कीजिए । देवी ने कहा-यज्ञों के भाग तो देवगणों के ही लिए पृथक्-पृथक् कल्पित हैं । अन्य कोई भी भाग शेष नहीं है जो मैं इस समय तुझे दूँगी । किन्तु हे महिषासुर! मेरे साथ युद्ध में तेरे निहित हो जाने पर तू मेरे चरणों को कभी नहीं त्यागेगा और निरन्तर चरण से संपुष्ट ही रहेगा । इसमें कुछ भी संशय नहीं है । हे दानव! जहाँ-जहाँ पर भी मेरी पूजा प्रवृत्त होती है वहाँ पर यह तुम्हारा शरीर भी पूजा के और चिंतन करने के योग्य होगा । प्रातःकाल में यह उस देवी का वचन सुनकर महिषासुर वहाँ पर वर प्राप्त करके परम प्रसन्न हुआ । उसने कहा-हे उग्रचण्डे! हे दुर्गे! हे भद्रकाली! हे देवि! आपकी सेवा में मेरा नमस्कार है । हे देवि! आपकी बहुत सी मूर्तियाँ हैं और आपके द्वारा समस्त परिपूर्ण हैं । हे परमेश्वरि! मैं यज्ञ में किन मूर्तियों के द्वारा पूज्य होऊँगा । यही आप मुझे बताइए यदि आपके द्वारा मेरे ऊपर यहाँ पर कृपा की गई है । देवी ने कहा-हे महिषासुर! यहाँ पर आपने जो भी नाम कहे हैं उन मूर्तियों में संस्पुष्ट होता हुआ लोक में तुम पूज्य होओगे । जो उग्रचण्डा

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