कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४६ श्रीकालिका पुराण मूर्ति है फिर मैं भद्रकाली हूँ जिस मूर्ति के द्वारा मैं तेरा हनन करूँगी वह दुर्गा कीर्त्तित की गयी है । इन मूर्तियों में सदा ही तुम मेरे चरणों के पूज्य होओगे । प्राचीन काल में जब सृष्टि का आदि काल था उस समय उग्रचण्डा मूर्ति के द्वारा तुम्हारा हनन किया गया था । दूसरी सृष्टि के समय में आपको भद्र काली मेरे द्वारा निहित किया गया था । और इस समय में दुर्गा के स्वरूप के द्वारा तुमको तुम्हारे अनुगामियों के सहित हनन करूँगी किन्तु पूर्व में मेरे द्वारा चरण के तल में तुमको ग्रहण करने वाले हो गए हो । अतएव पूर्व कालों में ग्रहण किए गए हो और पीछे भी यज्ञ भाग की मुक्ति के लिए ग्रहण करने के योग्य हो गए हो । और्व मुनि ने कहा-इतना कहकर उस महामाया ने उग्रचण्डा नाम वाले तनु को उस समय में महिषासुर को दिखा दिया था । जो मूर्ति सोलह भुजाओं वाली थी और भद्रकाली, इस नाम से विश्रुति थी उसी भाँति मूर्ति को अमर बाहुओं से धारण करने वाली थी । दक्षिण की ओर नीचे गदा रखे हुए बांये हाथ से पान पात्र को रखे हुए थी जो सुरों से भरा हुआ था । शिर में नर मुण्डों की माला धारण करने वाली थीं । भिन्न हुए अंजन के समान थी, प्रचण्ड स्वरूप वाली और सिंह के वाहन वाली थी । लाल वर्ण वाले नेत्र थे, महती काया थी और अठारह बाहुओं से युक्त थी । उग्रचण्डा और भद्रकाली ये दो मूर्तियाँ थी । ऐसे स्वरूप का दर्शन करके शीघ्र ही महिषासुर ने उनको प्रणिपात किया था और वह बहुत ही विस्मय को प्राप्त हो गया था । इसके अनन्तर जिस रीति से आक्रान्त करके महिषासुर को निहित किया था ठीक उसी भाँति दोनों देवियों ने उसको चरण के तल से नीचे ग्रहण कर लिया था । उसका हृदय शूल से विदीर्ण किया हुआ और महिषासुर बिना शिर वाला था । देवी के द्वारा उसके केश ग्रहण किए हुए थे और निकलती अँतड़ियों से भूषित हो रहा था । जिसके मुख से रुधिर निकल रहा था, ऐसा जिसका शरीर था ऐसे अपने पूर्व शरीर को उसने देखा था । वह असुर भय को प्राप्त करके बहुत चिन्ता एवं शोक करने लगा था तथा मोह को प्राप्त हो गया था । इसके अनन्तर