भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 344, कुल 442 में से

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पृष्ठ 344

≎ श्रीकालिका पुराण ≎ ३४७ एक ही क्षण में दानव ने अपने आपको संस्तम्भित किया था और उसने देवी को प्रणाम किया था तथा गद्गद् होकर देवी से उसने यह वचन कहा-महर्षि ने कहा-हे देवि! यदि आप मुझ पर परम प्रसन्न हैं और आपने यज्ञ के भागों को मेरे लिए कल्पित किया है तब मेरा अन्य जन्म प्राप्त न करूँ। देवी ने कहा-आपने मेरी आराधना की है अतएव मैंने आपको वर दे दिया है। यहाँ पर तुम मेरे ही द्वारा वध्य होगे, इस विषय में कुछ भी विचार तुमको नहीं करना चाहिए। जो भी तुमने प्रार्थना की है कि मेरा विरोध सुरों के साथ न होवे, यह भी सब हो जायेगा। हे दानव! मेरे चरण के तल के स्पर्श से तेरा शरीर यज्ञ भागों से उपभोग करने के लिए विशीर्ण नहीं होगा। हे महासुर! तेरे जीवात्माओं के साथ प्राण सब ही भगवान् हर के पाद के संयोग से केवल चिरकाल पर्यन्त स्थित रहेंगे। हे महिषासुर! सहस्रों करोड़ कल्प तक और चिरकाल पर्यन्त तेरे जन्म न होंगे। इस प्रकार से यह वर देवी ने उस महिषासुर को देकर उस असुर के द्वारा शिर से प्रणत होती हुई वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गई थी। वह महिष भी हे नृप! पुनः माया के द्वारा सम्मोहित होता हुआ पूर्व की भाँति आसुरी भाव का आदान करके अपने स्थान को चला गया था। राजा सगर ने कहा-माया के द्वारा अनेक दैत्य निहित किए गए थे जिनका वध लोकों की विभूति के लिए ही हुआ था। उसको शुभ वरदान देकर वे पुनः प्रगृहीत नहीं हुए थे। यह किस कारण से वर देकर कैसे पुनः प्रगृहीत हुआ था? हे द्विजोत्तम! मुझे यह बतलाने की कृपा करें। और्व मुनि ने कहा-सुरों के बैरी रम्भ के द्वारा वे भगवान् शंकर परम प्रसन्न हो गए थे। इसके अनन्तर परम प्रसन्न महादेव जी प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित होकर उस रम्भ से बोले थे कि मैं तुम पर परम प्रसन्न हो गया हूँ अब जो भी तेरा इच्छित हो मुझसे वरदान का वरण कर लो। इस रीति से कहा हुआ रम्भ भगवान् चन्द्रशेखर से बोला था। हे महादेवजी! मैं बिना पुत्र वाला हूँ। यदि आपका मुझ पर अनुग्रह हो तो, हे शंकर! मेरे तीन जन्मों में आप ही मेरे पुत्र होकर जन्म ग्रहण