कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ करें। ऐसा ही पुत्र हो जो समस्त प्राणियों के द्वारा अवध्य हो और देवगणों का नेता होवे । हे शंकर! वह मेरा पुत्र ऐसा हो जिसकी आयु चिरकाल तक होवे, यह यशस्वी और लक्ष्मीवान् होवे । इस प्रकार से जब उस दैत्य के द्वारा प्रार्थना की गई तो भगवान् वृषभध्वज ने कहा- यह तेरा वांछित हो जावे और मैं तेरा पुत्र जाऊँगा । इतना ही कहकर भगवान् वृषभध्वज वहाँ पर जावे और मैं तेरा पुत्र जाऊँगा । इतना ही कहकर भगवान् वृषभध्वज वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गए थे । रम्भ भी प्रसन्न होता हुआ अपने निवास स्थान को चला गया था । मार्ग में गमन करते हुए उस रम्भ ने शुभ महिषी को देखा था । वह महिषी त्रिहायणी, चित्र वर्ण वाली परम सुन्दरी और ऋतुशालनी थी । उस रम्भ ने उस महिषी को देखा था और कामदेव से मोहित हो गया था अर्थात् महिषी को ग्रहण करके उसके साथ सुरतोत्सव किया था फिर रति क्रीड़ा के प्रवृत्त हो जाने पर उसी समय में वह महिषी उसके तेज से युक्त होकर वह गर्भवती हो गयी थी । महिषी ने गर्भ धारण कर लिया था तभी उसके उदर से महिषासुर समुत्पन्न हुआ था । उस महिषी में अपने ही यश से भगवान् शंकर ने उसके पुत्र हो जाने की प्राप्ति की थी । वह रम्भ का पुत्र राम्भि शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की ही भाँति बड़ा हो गया था । कात्यायन मुनि ने उस महिषासुर के लिए शाप दे दिया था । शिष्य के अर्थ में उसको दुर्जय अवलोकन करके शिष्य पर अनुग्रह करने वाले चन्द्रशेखर ने कात्यायन के द्वारा शाप दिए हुए उस महिषासुर का ज्ञान प्राप्त करके चण्डिका से प्रणाम पूर्वक कहा- ईश्वर ने कहा-आज हे देवि! यह महिषासुर कात्यायन के द्वारा शापित किया गया है । इसके विनाश करने वाली योषित होगी । इससे हे जगन्मये ! ऋषि का वाक्य बिना किसी सन्देह के ही पूर्ण होगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है । यह महिष मेरा ही शरीर है । हे जगन्मयि! यह तुम्हारे द्वारा करना है और इसका हनन करना है । पूर्व और पर में भी निरन्तर योग से युक्त मैं हरि के स्वरूप से तुमको वहन