कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३४२ करने में अब समर्थ नहीं हूँ। मेरा यह शरीर महिष तुम्हारा बोझा होगा। यह महादेवजी ने पूर्व में पहले देवी से प्रार्थना की थी। इससे देवी ने महिषासुर महादेव को ग्रहण किया था। उसने उसी प्रकार का आसुर तप का तपन किया था जो परम दारुण था। उसी भाँति भगवान् शम्भु की आराधना की थी और पुत्रार्थ वरदान प्रदान किया था। उसी रीति से उसने अपनी महिषी की सुरत के लिए सेवन किया था। उसमें उसी प्रकार से दानव महिषासुर दानव वीर हुआ था। भगवान् कात्यायन भी उसी प्रकार के उसको शाप दिया था। पूर्व जन्म में इस प्रकार से प्रवृत्त होने पर उसने अन्य जन्म में महिष ने देवी का पूजन करके वर की याचना की थी। तीसरे जन्म में वर प्राप्ति करके अशेष कल्पों में यहाँ पर मेरा जन्म न होवे, यह वरदान माँगा था। इस कारण से देवी के चरणों के तल में इस समय में महिषासुर स्थित रहा करता है। इस प्रकार से देवी के प्रसाद से महादेवजी के अंश से उत्पन्न होने वाले महासुर ने निरन्तर परा प्रतिपत्ति का लाभ किया था। यह आज भी देवी के चरणों के तल की प्राप्ति से परम प्रसन्न होता है। हे राजन्! यह आपके समक्ष में सब कहकर सुना दिया है। हे राजन! अब प्रस्तुत विषय का आप श्रवण कीजिए। हे नृपोत्तम! मैं आपके सामने कहता हूँ। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-जिस तरह से राजा सगर था और देवी, महर्षि के यजन में और्व के साथ सम्वाद किया था। यह सभी आपको बता दिया गया है। कामाख्या माहात्म्य और्व मुनि ने कहा-जिस रीति से भगवान् महादेव ने महात्मा भैरव से कहा था। हे नृप श्रेष्ठ! आप उसी भाँति सुनो। श्री भगवान् ने कहा-जो उग्रचण्डा मूर्ति हैं और जो अठारह भुजाओं वाली हुई थी वह पहले कन्या राशिगत सूर्य के होने पर कृष्ण पक्ष में नवमी में करोड़ों योनियों के सहित महामाया प्रादुर्भूत हुई थी। आषाढ़ मास की पूर्णिमा