कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३५० ᠅ श्रीकालिका पुराण ᠅ में द्वादश वर्ष का होने वाला सत्र होता है । सत्र को करने के लिए प्रजापति दक्ष ने समारम्भ किया था और सभी देवों का वरण किया गया था, उसने मुझे वरण नहीं किया था । अर्थात् महात्मा दक्ष ने मुझे आमन्त्रित नहीं किया था । वे कपाली अर्थात् कपालधारी हैं और सती उनकी पत्नी है, इसलिए वरण नहीं किया था । इसके पश्चात् रोष से समायुक्त होकर उस सती ने प्राणों का परित्याग कर दिया था । देह के त्याग करने वाली सती फिर उस समय चण्डमूर्ति हो गई थी । फिर बारह वर्ष में पूर्ण होने वाले उस यज्ञ के प्रवृत्त होने पर कन्या के सूर्य में कृष्णपक्ष में नवमी तिथि के दिन चण्डमूर्ति को धारण करने वाली योगनिद्रा महामाया ने करोड़ों योगिनियों के साथ यज्ञ का नाश कर दिया था । उस महामाया ने सती के स्वरूप का परित्याग करके यज्ञ का विध्वंस कर दिया था । वह सभी भगवान् शिव के गणों तथा शंकर के भी सहित थी । महात्मा देव के उस महामन्त्र को उस देवी ने स्वयं भंग किया था । फिर महादेवी के महान् क्रोध के व्यतीत हो जाने पर देवगणों ने पूर्व में वर्णित प्रकार से उस अनुपम देवी की पूजा की थी । देवों ने पूर्व वर्णित विधान से इस देवी की पूजा की थी । देवों ने दुखों की हानि के लिए पूजा करके ही परम निवृत्ति की प्राप्ति की थी । इसी प्रकार से अन्य जनों को भी सदा देवी का पूजन करना चाहिए । अतुल विभूति की प्राप्ति के लिए इस चतुवर्ग को प्रदान करने वाली पूजा को अवश्य सदा सबको करनी चाहिए । जो मोह वश या आलस्य से इस महोत्सव के अवसर में देवी पूजा नहीं करता है तो उससे देवी परम क्रुद्ध हो जाती है और अभीष्ट कामनाओं का हनन किया करती हैं । बहुत जाति वाली बलियों के द्वारा, भोजनों से, सिन्दूर, रक्त वस्त्र अनेक प्रकार के विलेपन, पुष्प जो नाना प्रकार के हों, बहुत तरह के फलों के द्वारा पूजन करना चाहिए । इस महाष्टमी में जो पुत्र वाला हो उसे उपवास नहीं करना चाहिए । जिस किसी प्रकार से भी पवित्र आत्मा वाला व्रतधारी देवी का यजन करे । महाष्टमी में पूजा करके