कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 351, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें३५४ ०८ श्रीकालिका पुराण ८० चमर धारण कर रही है । क्रम से बायें में हाथ खर्पर को धारण करने वाली हैं । स्वयं शिर के शरीर एक जटा को धारण कर रही हैं । जो द्युलोक को मानो जटा से लिख रही होवें । मस्तक में मुण्डों की माला पहने हुए हैं और सर्वदा ग्रीवा में भी मुण्डमाला धारण करती है । उनके वक्षस्थल में नागों का हार है और उनके नेत्र रक्तवर्ण के हैं । कटि में कृष्ण वर्ण के वस्त्र धारण करने वाली हैं तथा बाघम्बर से भी समन्वित रहती हैं । उनका बाँया चरणशिव के हृदय पर है तथा दाहिना चरण सिंह की पीठ पर संस्थापित हो रहा है और स्वयं शव को अपनी लम्बी जिह्वा से चाट रही है । अट्टहास करती हुई महान् घोर ध्वनि वाली अत्यन्त ही भीषण स्वरूप वाली है । निरन्तर सुख की इच्छा वाले भक्तियुक्त भक्तों के द्वारा आगे वह तारा देवी चिन्तन के योग्य हैं । अब देवी को जो आठ योगिनियाँ कही गई हैं उनको मैं बतलाऊँगा । उनके सब नाम बताये जाते हैं, महाकाली, रुद्राणी, उग्रा, भीमा, घोरा, भ्रामरी, महारात्रि और आठवीं भैरवी बताई गई है । उन योगनियों का यजन करना चाहिए । हे भैरव! जो कालिका के कायकोष से निकली थी वह कौशिकी इस शुभ नाम से विख्यात हुई थी । यह परम सुन्दर, स्वरूप वाली और अत्यधिक मनोहर थी । यह देवी के हृदय से निःसृत हुई थी । रसना के अग्रभाग से चण्डिका निकली थी । यह इतनी अधिक सुन्दर थी कि इनके समान कोई भी अपनी मूर्ति की चारुरूपता से युक्त नहीं थीं । तीनों लोकों में कान्ति से इसके तुल्य कोई भी नहीं है और न होगी । जो महामाया योगनिद्रा मूल प्रकृति मानी गयी है । जो यह कौशिकी देवी कही गयी है यह उसकी प्राण की स्वरूप वाली है तथा इसका नेत्र बीज कहा गया है । हे भैरव! इसका मन्त्र और मूर्तिरूप को मैं कहूँगा । समाप्ति नान्त्य दन्त्य बिन्दुओं के सहित सर्वांगादि और परस्पर में संस्पृष्ट हो और बिन्दु से समलंकृत होवे यह कौशिकी मन्त्र का तन्त्र है जो समस्त काम और अर्थ का देने वाला है । उसकी जो यहाँ पर मूर्ति है उसको मैं बताऊँगा । आप एक मन वाले होकर उसका श्रवण करिए यह जगत् के आह्लाद को करने वाला है ।