कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर उस समय तप के द्वारा ब्रह्मा जी को परम सन्तुष्ट कर लिया था । ब्रह्माजी के द्वारा वर प्राप्त कर लिया था । शुम्भ ने इन्द्र के पद को प्राप्त करके इन्द्रत्व प्राप्त कर लिया था और निशुम्भ ने चन्द्रत्व प्राप्त कर लिया था । इन्होंने समस्त देवगणों के जो यज्ञों में भाग थे उनका उपाहरण कर लिया था । स्वयं शुम्भ और निशुम्भ ने दिक्पालों के पद को प्राप्त कर लिया था । इन्द्र के सहित समस्त देवगण फिर हिमाचल पर गए थे और गंगावतरण के स्थल के समीप में उन्होंने महामाया की स्तुति की थी । नाना भाँति से स्तवन की हुई देवी जो कि सभी देवों के समुदायों द्वारा स्तुत हुई थी । मातंग वनिता का स्वरूप धारण करके उस देवी ने देवगणों से पूछा था-हे देवगणों! यहाँ पर आपके द्वारा कौन सी भामिनी का स्तवन किया जा रहा है और आप लोग यहाँ पर किसलिए समागत हुए हैं ? किस प्रयोजन की सिद्धि के लिए इस मातंग के आश्रम की ओर आये हैं ? इस प्रकार से यह बोलती हुई उस मातंगी के कायकोष से समुद्भूत हुई देवी ने कहा-ये सुरगण मेरा ही स्तवन कर रहे हैं । शुम्भ और निशुम्भ ये असुर समस्त देवों को बाधा दिया करते हैं । इसी कारण से उन दोनों का वध करने के लिए इन समस्त सुरों के द्वारा मेरा स्तवन किया जा रहा है । मातंगी के कायकोष से देवी के विनिःसृत होने पर वह गौरी पिसे हुए अञ्जन के समान ही एक ही क्षण में कृष्ण वर्ण की हो गयी थी और वह हिमवान् पर्वत में समाश्रय वाली थी । ऋषिगण जो मनीषी है उसको यहाँ पर उग्रतारा नाम से कहा करते हैं । यह अम्बिका देवी सदा भय से भी परित्राण किया करती हैं । इसका प्रथम बीज तीनों ही कहे गए हैं । यह इसी कारण से एक जटा नाम वाली है क्योंकि एक ही जटा वाली है । हे बेताल भैरव! इसका चिन्तन अर्थात् ध्यान जिस प्रकार से भक्त ध्यान करके अपना अभीप्सित प्राप्त किया करता है कि वह चार भुजाओं से समन्वित है उनका वर्ण एकदम कृष्ण है और यह नरमुण्डों की माला से शोभायमान है । दाहिने हाथ से वह खंड को धारण किए हुए हैं और अधोभाग में