भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 442 में से

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पृष्ठ 357

३६० श्रीकालिका पुराण करने में समर्थ होता है । इसलिए नृप को चाहिए कि अपनी इन्द्रियों को तथा मन को अपने वश में रखकर ज्ञान के मार्ग में अविष्टित होकर आत्मा का हित सम्पादित करे । फिर अपनी इच्छा से भोग करना चाहिए । जो सुनने योग्य है उसे ही श्रवण करना चाहिए । श्रवण में अधिक समाचरण न करे । शास्त्रों के तत्त्वामृत में धीर श्रुति वश्य नहीं होता है । इस रीति से इच्छा से घ्राण, त्वचा को वशीकृत करके अपनी इच्छा से उपभोग न करे और उद्दाम विषय का गमन न करना चाहिए । यदि राजा इसी रीति से समाचरण करने वाला होवे तो उसी समय में वह इन्द्रियों को जीत लेने वाला हो सकता है । जितेन्द्रिय होने में शास्त्रों और वृद्धों का उपसेवन करना ही हेतु हुआ करता है । जो नृप वृद्धों का सेवन करने वाला नहीं होता तथा शास्त्रों का ज्ञाता नहीं होता है वह शत्रुओं के वशीभूत हो जाया करता है । इस कारण से शास्त्रों में अधिष्ठित होकर राजा को जितेन्द्रिय होना चाहिए । धृति, दान, मैत्री, कृतज्ञता, वाक्पटुता, विवेचन, दक्षता, धारयिष्णुता, दान, दृढ़नुशासनता, सत्य, शौच, युद्ध का विशेष निश्चय, दूसरों के अभिप्राय का ज्ञान करना, चरित्र, आपत्ति में धीरज, निन्दा न करना, क्रोधी न होना, गुरु द्विजों का अर्चन, इन गुणों का राजा को अभ्यास करना चाहिए । धर्म अर्थ और काम में कार्य और अकार्य का विभाग का निरन्तर प्रतिबोध करना चाहिए और अवसर होने पर उसे करना चाहिए । साम, दाम, भेद और दण्ड वह चतुष्टय अर्थात् चार बातें हैं । उसके कालों में उपायों का ज्ञान करके उनके उपायों का प्रयोग करे । साम विषय में भेद मध्यम कहा गया है । दान के समय में साम योग्य ही उपलक्षित होता है । दान के विषय में दण्ड अधम कहा गया है । दण्ड के विषय में दान जो होता है, वह भी अधम ही कहा जाता है । साम के गोचर अर्थात् प्रत्यक्ष होने पर जो दण्ड का प्रयोग है वह अधम से भी अधम कहा गया है । राजा के दण्ड और भेद में निरन्तर सौजन्य जानना चाहिए । साम और दाम की सुजनता गोचर में जाती है । काम, लोभ,