कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६१ हर्ष, नाम, मद, इनको अतिशय रूप में होने वालों का राजा के शत्रुओं की तरह विनष्ट कर देना चाहिए । संयुक्त काल में ही उसका सेवन करना चाहिए । लोभ और गर्व को विवर्जित कर देवे । नृपों का तेज ही तीव्र होता है । जिस तरह से सूर्य का हुआ करता है । उसमें गर्व रोग से युक्त होता है जिस कायमान् को उसको त्याग कर देना चाहिए । आखेट, अक्ष, स्त्री सेवन, पान और अर्थ दूषण, वाणी और दण्ड में कठोरता इन सबका वर्जन कर देना चाहिए । विरक्त पुरुष पराई स्त्रियों में सेवन करना एकान्त रूप से वर्जित कर देवे । अपनी सती नारियों में युक्त सेवन करना चाहिए । जो दाराऐं रति और पुत्र के फल वाली हैं उनका रूप से त्याग नहीं करें । रति और पुत्र दोनों की सिद्धि के लिए स्त्रियों को सेवन करना चाहिए । किन्तु उनमें अत्यन्त आसक्ति का वर्जन कर देवे । मृगया जो प्रमादो का स्थान होता है, इसका नित्य वर्जन कर देवे । अक्षों का भी सेवन न करे, ये सत्यकार्य और शक्ति का विनाश करने वाले होते हैं । अकार्यों के करने में और कृत्यों के वर्जन में यह बीज होता है । अकाल मन्त्र भेद में कलह में सत्कार के क्षय में निरन्तर सुरापान का वर्जन कर देवे जो कि यह मदिरा पान, शौच और मांग्ल्य का विनाश करने वाला होता है । यह अर्थ के क्षय का करने वाला होता है । अतएव इसका त्याग कर देना चाहिए । अभिशस्त, चोर-घातक, आततायी में राज को निरन्तर दण्ड की कठोरता नहीं करनी चाहिए । सदा सत्य की रक्षा करनी चाहिए । एक सत्य में ही परायण रहे । क्षमा और तेजस्विता का प्रस्ताव से नृप को समाचरण करना चाहिए । यान, आसन, आश्रय, द्वैध, सन्धि तथा विग्रह-इन छह गुणों तथा इनके शाश्वत स्थान का नृप को अभ्यास करना चाहिए । जो स्थान, वृद्धि, क्षय, कोष, जनपद में और दण्ड में जो परिमाण को नहीं जानता है वह राज्य पर अवस्थित नहीं करता है । वह एक-एक में तीन-तीन हैं । प्रस्ताव से विनियोग करना चाहिए । किसी एक की ही रक्षा न करे, इन सबकी रक्षा करनी चाहिए । मित्र, शत्रु और उदासीन