भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 442 में से

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पृष्ठ 359

३६२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓࿓ तीनों में ही अपने प्रभाव करना चाहिए । नृपों को विजय की इच्छा में, धर्म कृत्य में अष्ट वर्ग में, शरीर यात्रा निर्वाह मे निरन्तर उत्साह करना चाहिए । मन्त्र के निश्चय से समुत्पन्न बुद्धि को सर्वत्र योजित करे, अमात्य में, शास्त्र में, राज्य में, पुत्रों में और अन्तःपुर में बुद्धि का योजन करना चाहिए । कृषि, दुर्ग, वाणिज्य, खङ्गों का कर साधन, सैन्य करों का आदान, गजों और अश्वों का बन्धन, सदम सुखों के शून्य में जनों के द्वारा निरन्तर योजन और तीन सार सेतुओं का बन्धन आठवाँ हैं । इन आठ वर्गों में चारों को भली भाँति प्रयोजित करना चाहिए । कार्य और अकार्य के विभाग के लिए अष्ट वर्ग के अधिकारियों को योजित करे । राजा को अष्ट वर्गों के लिए नियोजित करे । दश को शून्य में नियुक्त करे । उनको क्रम से मुझसे सुनिए । स्वामी, सचिव, राष्ट्र, मित्र, कोष, जल, दुर्ग और गुरु भाषित राज्य के अंग हैं । दुर्ग से युक्त अपने अष्ट वर्ण से चारों को योजित करे । इस कारण से इन शेष पाँच चार पदों को शुद्धान्तों में, पुत्रों में, यथादि में, अहासन में, शत्रु और उदासीनों से, बल, अबल के विशेष निश्चय में, इन अठारहों में राजा चारों को प्रयुक्त करे । प्रकाश में इनको कोई भी न जान पावे उसी भाँति चारों के द्वारा निरूपित कर देना चाहिए । उसका प्रतिकार अवश्य ही निरूपण करके छिद्र से समाचरण करे । यहाँ पर नृप को ज्ञान प्राप्त करके जो कि चारों के द्वारा किया जावे दण्ड देवे या चारों को अलग कर देवे । नृप मन्त्री के साथ एकांत में स्थित रहे । राजा को चाहिए कि प्रदोष के समय में पूछे और उसी समय में साधन करे । अपने पुत्र के समय में शुद्धान्तः पुर में और जो चार महासन (रसोई गृह) में नियुक्त होवें उनसे मध्य रात्रि में पूछना चाहिए । और जो अपने मन्त्री के विषयवार हों उनसे राजा के बिना मन्त्री के स्वयं ही पूछे । अन्य जो चार हों उनसे मन्त्री के साथ निरूपण करके फल को प्रदेशन करके चार एक के धारण करने वाला न होवे, न एक ही होवें और न उत्साह से रहित होना चाहिए । चार सर्वत्र