भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 360, कुल 442 में से

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पृष्ठ 360

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६३ संस्तुत नहीं होना चाहिए। वह अत्यन्त लम्बा न होवे और न बोना ही होना चाहिए। निरन्तर दिन में चरण करने वाला चार होना चाहिए। और वह रोगी तथा बुद्धि रहित भी नहीं होवे। चार चित्त के वैभव से हीन भी न होवे और ऐसा भी नहीं चाहिए जिसके भार्या तथा पुत्र न होवे। ऐसा ही चार राजा को तत्व गुह्य के विशेष निर्णय के नियुक्त करना चाहिए। राजा को अपना चार कैसा बनाना चाहिए यह बताया जाता है, जो अनेक प्रकार के वेषभूषा के ग्रहण करने में समर्थ हो, भार्या और पुत्रों में संयुत होवे। बहुत से देश और वाणियों का अभिज्ञ होवे तथा दूसरों के अभिप्राय का ज्ञाता होवे। चार ऐसा ही करना चाहिए जो दृढ़भक्त, समर्थ और भय रहित होवे। राजा कृषि में अपने ही समानों के साथ स्थित होवे। वाणिक्पथ में और दुर्ग आदि में जो शक्त हों उनको ही नियोजित करना चाहिए। अन्तःपुर में चारों को नियुक्त करे जो पिता के तुल्य होवें, धीर होवें और वृद्ध होवें। शुद्धान्तःपुर में तथा द्वार में ऐसों की नियुक्ति करे जो वृद्ध और मनीषिणी होवें। राजा को अकेला कभी शयन नहीं करना चाहिए और अकेला भोजन भी नहीं करना चाहिए। अकेली महिषी का गमन न करे और एक ही की मैत्री के लिए भी कुछ नहीं करना चाहिए। अमात्यों की, उपधा शुद्धों की, भार्याओं को तथा पुत्रों को प्रसाद के सहित समाचरण करते हुए नृप को निरन्तर करना चाहिए। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से प्रत्येक का परिशोधन के द्वारा प्राप्त होकर धारण किया जाता है इसी कारण से वह उपधा कही जाती है। अर्थ, काम की उपधाओं से भार्या और पुत्रों का परिशोधन करे। धर्म की उपधाओं से सचिवों का शोधन करे। इनके द्वारा, यज्ञों से और दोनों के द्वारा यहाँ पर ही नृप होता है। इस कारण से आप राज्य के अर्थी हैं अतएव इसी भाँति धर्म का ही समाचरण करे। इसी अभिचार से अथवा अज्ञों के यह राजा प्राणों का त्याग करता है और तुम राजा हो जावोगे। इसमें कुछ भी संशय नहीं है। यही नृप का धर्म है और