भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 442 में से

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पृष्ठ 361

३६४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ जो अश्वमेध का आदिक है राजा स्वयं नहीं करता है इस कारण से हे श्रेष्ठतम! तुम करो । इस प्रकार से नृप कायान्तिक द्विज से मंत्रों के द्वारा मंत्रणा करके उनके द्वारा अज्ञातों को स्वयं ज्ञान प्राप्त करके उनसे उसके मन को ग्रहण करे । यदि राज्य की अभिलाषा से सचिव अधर्म का आचरण करे अथवा राजा के विषय में अधिक करे तो उस धर्म को हीन बना देवे । अत्यन्त आभिचारिक कर्म को करने वाले का विघात कर देवे । राजा को चाहिए कि अभिचारिक ब्राह्मण हो तो उसको देश से बाहर निकलवा दे । यह धर्मोपधा जाननी चाहिए उनके अमात्यों को और सुतों को विजित करे । इस प्रकार की उसी भाँति अन्य उपधा का धर्म से समाचारण करना चाहिए । कोषाध्यक्षों को समन्वित करके राजा अमात्यों को प्रतारित कर देवे तथा पुत्रों को अथवा अन्यों को जो मन्त्र के संवरण करने में असमर्थ होवें प्रतारित कर देना चाहिए । हे नरोत्तम! यह प्रचुर बहुत बड़ा कोष मेरे अधीन है यदि उसकी आप प्रतीक्षा करते हैं तो आपकी सम्मति से उसे ले आता हूँ । आपके अर्थ के लग्न दोनों में हमारा जीवन होगा और आप भी इन प्रचुर कोषों के द्वारा क्या-क्या नहीं करोगे । इस प्रकार से अन्य कोषगत उपायों से नृप श्रेष्ठ पुत्र, अमात्य आदिक सबका निरन्तर परिशोधन करे । जो कोष में दोषों के करने वाले हैं उनका हनन कर देवे और जो करने की इच्छा रखते हों उनको देश से बाहर निकाल देना चाहिए । जो द्वैध चित्त वाले होवें उनको विमानित कर देवें किन्तु कोष की रक्षा हर प्रकार से करनी चाहिए । जो द्वैध चित्त वाले होवें उनको विमानित कर देवें किन्तु कोष की रक्षा हर प्रकार से करनी चाहिए । दासियाँ, शिल्पनी, वृद्धा, मेधा और धृति वाली स्त्रियाँ जो बाहर और भीतर गमन किया करती हैं तथा सचिवों आदि के द्वारा विदित हैं । राजा उसको भार्या आदि से अलक्षित होकर स्थित होकर स्थित रहकर एकांत में अभिमन्त्रण करके तथा इसके अनन्तर भली भाँति मन्त्रणा करके सचिवों के पास प्रेषित कर देवे । वे आकर वहाँ हृदय का ज्ञान प्राप्त करके विज्ञान में तत्पर