कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ ३६७ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ दुःख का भागी होता है। उनके साथ कभी विरोध नहीं करे और उनका धन ग्रहण नहीं करना चाहिए। कृत्य के कालों में निरन्तर उनका ही परिपूजन करना चाहिए। इस प्रकार से महान् बुद्धिमान तत्त्व मण्डल में संयुत नृप, अप्रमादी, चार चक्षु, गुणवान्, प्रियपद होता है। यहाँ पर और मृत्युगत होकर महती सिद्धि को प्राप्त होता है और सुखों के भोग वाला हुआ करता है। जिन गुणों से अपने आपको योजित करे उन गुणों से पुत्रों को भी योजित करना चाहिए। नृप की निरन्तर स्वतन्त्रता अपने आपका विनाश किया करती है। राजा का पुत्र स्वतन्त्र रहकर निश्चय रूप से विकार को प्राप्त हो जाता है। निर्विकार के लिए निरन्तर वृद्धों को पारियोजित करे। भोजन में, शयन में, यान में और पुरुषों के वीक्षण में सदा दाराओं को भय को काम विनेष्टन में नियोजित करना चाहिए। राजा के द्वारा स्त्रियाँ निरन्तर स्वाधीन रखनी चाहिए। स्वतन्त्र रहने वाली स्त्रियाँ नित्य ही हानि के लिए हुआ करती हैं। उस कारण से कुमार को और महिषी को मनोहर उपधानों से शोधन करके यौवराज्य और अवरोध में नियोजित करे। अन्तःपुर के प्रवेश में स्वतन्त्रता का निषेध कर देना चाहिए। राजा के पुत्र का, भार्या का यह विशेषता संक्षेप से नृप का धर्म मैंने बता दिया है। पुत्रों के गुणों के विन्यास में और राजा की भार्याओं के भी विषय में उशनों ने और बृहस्पति ने राजनीतियों के तन्त्रों को कहा है। अन्य विशेषताओं को उन दोनों के तन्त्रों में समझना चाहिए। इस प्रकार से महाभाग राजा राजनीति में विशेषता को करता हुआ कभी दुःखित नहीं होता है और सदा बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति किया करता है। [ सदाचार कथन ] और्व ने कहा-अब हे राजेन्द्र! सदाचारों में जो विशेषतायें हैं उनका श्रवण कीजिए। जिन्हें राजा को अवश्य ही करना चाहिए उन सबको आप मुझसे ही उन सबका श्रवण कीजिए। साधुगण क्षीण दोषों वाले