भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 442 में से

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पृष्ठ 365

३६८ ௵ श्रीकालिका पुराण ௵

होते हैं । क्योंकि सत् शब्द साधु वाचक हुआ करता है । उनका जो भी आचरण है वह सदाचार कहा जाया करता है । आगमों में, पुराणों में और संहिताओं में जिस प्रकार से कहे गए उन समुद्दिष्ट सदाचारों में गृहस्थ की भाँति ग्रहण करना चाहिए । वेदों के पाठों के द्वारा ऋषियों का यजन करे और होमों के द्वारा देवगणों का पूजन करे । श्राद्धों के द्वारा पितृगणों को तृप्त करे तथा बस्तियों के द्वारा भूतों को संतृप्त करना चाहिए । मैत्र, प्रसाधन, स्नान, दन्त, धावव, अञ्जन यह सब गृहस्थ की ही भाँति करे तथा निषेकाद्य विधि को करना चाहिए । राजा को चाहिए कि षट्कर्मों में सभी ओर से विप्रों की नियुक्ति करे । उसी भाँति क्षत्रिय आदि को अपने-अपने धर्म में नियोजित करे । जो अपने शास्त्रोक्त धर्म का परित्याग करके पराये के धर्म का समाचरण करे उसको राजा एक सौ पण का दण्ड देवे और फिर उसको उसी विहित धर्म में नियोजित करना चाहिए । एक सम्वत्सर में होने वाले कृत्यों में विशेष रूप से इनका समाचरण करना चाहिए । हे राजन्! राजा उन विशेषों का अवश्य ही समाचरण करे, उनका श्रवण मुझसे कर लो । शरत्काल में अष्टमी के दिन दुर्गा का परिपूजन करे । दशमी तिथि में बल की वृद्धि के लिए नीराजन करना चाहिए । पौष मास में तृतीया में पुष्य का अभिषेक करे और नृप पञ्चमी में श्रीदेवी का पूजन करके चरण करे । हे नृप श्रेष्ठ! धन धान्य की वृद्धि के लिए श्रीयज्ञ का समाचरण करना चाहिए । श्रेष्ठ मास में दशहरा के दिन भगवान् विष्णु की इष्टि का समाचरण करे । द्वादशी में हरिस्थ रवि के दिन में इन्द्रदेव की पूजा करनी चाहिए । राजा को इन यज्ञों का विशेष रूप से बहुत व्यय के द्वारा करना चाहिए । इनके किए जाने पर बल, राज्य और कोष भी वृद्धि को प्राप्त होते हैं । इन यज्ञों को न किए जाने पर देश में दुर्भिक्ष ( अकाल ) और मरण होता है । सब प्रकार की ईतियाँ होती हैं । ( टिड्डी आदि ईतियाँ हुआ करती है ) अतएव इनको विशेष रूप से करना चाहिए । शारत्काल में महाष्टमी तिथि में दुर्गा की पूजा की विधि है ।