कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३६९ यह विधि पहले कह दी गई है उसी विधि से पूजन करना चाहिए । हे पार्थिवों में परम श्रेष्ठ! आप नीराजन की विधि का श्रवण करिए । जिसके करने में अश्वों की और गजों की वृद्धि हुआ करती है । आश्विन मास में शुक्ल पक्ष में तृतीय तिथि स्वामी नक्षत्र की योग वाली हो । आठवें दिन के सम्प्राप्त हो जाने पर नीराजन करना चाहिए । नीराजन (आरती) का काल तो आपको मैंने बहुत पहले ही बता दिया है । अब तो केवल मुझसे विधान ही श्रवण करिए । इससे आप कृतकृत्य हो जायेंगे । हे महासत्व! एक अश्व जो सबसे बहुत ही सुन्दर होवे । सात दिन तक गन्ध, पुष्प, वस्त्र आदि से उसकी पूजा करे । तृतीया के आदि से अर्चन करके उसे यज्ञ मण्डल में ले जावे । उसकी चेष्टा का निरूपण करते हुए शुभ और अशुभ का ज्ञान करो । यदि अश्व पलायन करता है तो पराये राष्ट्र का अवमर्दन होता हैं । यदि वह अश्व अश्रुओं का मोचन किया करता है तो राजा के पुत्र की मृत्यु हो जाती हैं । ले जाया हुआ वह अश्व आदि गमन न करे तो महिषा का मरण हो जाता है । यदि अश्व मुख, नासिका और नेत्रों से शब्द करे तो जिस दिशा की ओर मुख करके ध्वनि करता है उस दिशा में शत्रुओं के ऊपर जय प्राप्त कराता है । यदि अश्व दाहिने पद के अग्रभाग को उत्क्षिप्त करके आगे होवे तो राजा सम्पूर्ण रिपुओं पर विजय प्राप्त किया करता है । हे नृप श्रेष्ठ! दशमी तिथि में प्रातःकाल में ही नीराजन करना चाहिए । उसकी अप्राप्ति होने पर उसी द्वादशी में समाचरण करना चाहिए । हे पार्थिव! अथवा वहाँ पर अभाव होने पर कार्तिक मास में पञ्चदशी में ऐशानी दिशा में जो अपने पुर से होवे । सोलह हाथों के मान के दश हाथ प्रमाण से युक्त और सोलह हाथ विस्तार वाला यज्ञ के लिए मण्डप बनावें और मध्य में वेदी का विनिर्देश करना चाहिए । वेदी के उत्तर दिशा में बहुत श्रेष्ठ अश्व वेदी की रचना करे । जहाँ पर संस्थापित करके पुरोहितों के द्वारा अश्व का पूजन करना चाहिए । हे नृप! उदुम्बर की शाखाओं का अथवा अर्जुन की शाखा के