भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 442 में से

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पृष्ठ 372

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३७५ हुआ भी मृत्यु को प्राप्त किया करता है । कूप के अन्दर प्रवेश तथा दक्षिण दिशा में गति, कीच में निमज्जन या स्नान, भार्या और पुत्र का विनाश करने वाला होता है । अन्य राज्य की प्राप्ति करके महान् कल्याण को प्राप्त किया करता है । बीस हाथ दीर्घ और सोलह हाथ विस्तार से युक्त सब लक्षणों से युक्त उत्तम यज्ञ मण्डल की रचना करनी चाहिए । इसके उपरान्त दूसरे दिन में पूर्वाह्न में मातृगणों की पूजा करे । भीत में लगी हुई वसोर्धारा तथा वृद्धि, श्राद्ध अर्थात् नान्दीमुख नामक श्राद्ध करे । चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, धूप, कर्पूर के चूर्ण मण्डल स्थान की भली भाँति पूजा करके उसमें 'हौं शाम्भवे नमः' 'अस्त्राय हूँ फट्' इन दो मन्त्रों को बुध को लिखना चाहिए । मन्त्र का ज्ञाता और मण्डल के ज्ञान रखने वाला पुरुष कम्बल से उत्पन्न सूत्रों से अथवा कौशेयों से प्रथम स्वस्तिका नामक मण्डल का लेखन करे । फिर चार हाथ प्रमाण वाला मण्डल लिखना चाहिए । मण्डल का पद्म एक हाथ प्रमाण वाला कहा गया है । डेढ़ हाथ के प्रमाण वाले द्वार होने चाहिए । वह पद्म कर्णिमा के केसरों से समुज्ज्वल होवे । सफेद, लाल, पीला, कृष्ण और हरा और शीली के चूर्ण से, कौसुम्भ से तथा हरिदुद्भव हान्द्रि से अन्जन के चूर्ण से मण्डल की वृद्धि के लिए रचना करे । पद्म के अन्दर से आरम्भ करके पश्चिमगामी ताल को और पश्चिम के द्वार के मध्य में सौ हाथ विनिर्दिष्ट करना चाहिए । द्वार के मध्य में सौ हाथ विनिर्दिष्ट करना चाहिए । द्वार मध्य में प्रत्येक आठ पत्रों वाला होना चाहिए । मण्डल के भाग में ज्ञात को चूर्णों से पृथक्-पृथक् ही करना चाहिए । चूर्णों के द्वारा मण्डल की रचना करके फिर सूत्रों को उत्साहित करे । सूत्र का उत्सारण करके प्रथम मण्डल का अर्चन करना चाहिए । 'भवनाय नमः' इससे फिर हाथ से विनियोजित करे । मध्यमा, अनामिका और अंगुष्ठ से इच्छानुसार ऊपर नीचे की ओर मुख वाली अंगुलियों को करके विचक्षण पुरुष पातन कर देवे ।