भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 442 में से

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पृष्ठ 373

३७६ श्रीकालिका पुराण रेखा समान करनी चाहिए जो विच्छिन्न और पुष्परंजित हो । ज्ञाता पुरुष के द्वारा अंगुष्ठ के पर्व की निपुणता से समादी करनी चाहिए । संसक्त, विषय, स्थूल, विछिन्न, कृसराकृत, पर्यन्त, अर्पित और ह्रस्व कभी भी नहीं लिखनी चाहिए । यदि रेखा संसक्त हो तो उससे कलह जानना चाहिए और ऊर्ध्व रेखा में विग्रह होता है । अत्यधिक स्थूल होने पर व्याधि होती है, विमिश्रत होने पर नित्य पीड़ा होती है । बिन्दुओं से भय को प्राप्त हुआ करता है, जो कि शत्रु के पक्ष की ओर से हुआ करता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है । कृपा में अर्थ की हानि होती है और रेखा छिन्ना हो तो उसमें निश्चय ही मरण हुआ करता है अथवा अभीष्ट द्रव्य या सुत का वियोग होता है । जो भी कोई न जानकर ही इच्छा के ही अनुसार मण्डल का लेखन करे तो वह सभी दोषों को प्राप्त किया करता है जो भी दोष पूर्व में बताये गए हैं । ज्ञान रखने वाले पुरुष के द्वारा सफेद सरसों और दूर्वा से रेखा करनी चाहिए । मण्डल बारह होते हैं, उनके नाम विमल, विजय, भद्र, विमान, सुभद्र, शिव, वर्धमान, देव, शताक्ष, काम्यादक, रुधिर, स्वास्तिक, ये ही बारह मण्डल हैं । विचक्षणों द्वारा स्थान और यज्ञ के अनुसार ही योजित करना चाहिए । सुरों के समूहों द्वारा अमृत के लिए सागर के मन्थन लिए जाने पर पीयूष के धारण के लिए विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित किए गए थे । क्योंकि देवी की कलींकला-कला पृथक्-पृथक् आसन करके वे किए गए हैं इसी से वे कलश नाम से कीर्तित हुए हैं । कलश नौ ही बताये गए हैं । अब इनको नाम से समझ लो । गोह्योयगोह्य मरुत, मयूख, मनोहाचार्य, भद्र, विजय, तनुदूषक, इन्द्रिघन, विजय ये नौ कहे गए हैं। हे भूप! उनके ही दूसरे नौ नाम भी हैं उनका श्रवण करो जो सदा ही शान्ति प्रदान करने वाले हैं । प्रथम क्षितीन्द्र कहा गया है दूसरा जनसम्भव होता है । दो दो पवन और अग्नि हैं, फिर यजमान है । कोषसम्भव नाभि में छठवाँ कहा गया है । सोम सातवाँ कहा गया है और आदित्य आठवाँ है । विजय नाम वाला कलश है वह नवम कहा