भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

३८६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ प्रिय नहीं होता है । उसकी पूजा सब की पूजा है । भगवान् केशव आदि वहाँ पर ही सब विराजमान रहा करते हैं । समस्त कलुषों का अपहरण करने वाला व्याधि और दुर्भिक्ष का नाशक, सकल भवों का विशेष, सब प्रकार के सौभाग्य का सम्पादन करने वाला, शक्रकेतु का सुरपति के गृह की वाणियों से वाचनप्रिय शरत्काल में अनेकोपचारों के द्वारा श्री वृद्धि के लिए पूजन करना चाहिए ।

राजा के पालनीय नियम

और्व ने कहा-हे नृप! ज्येष्ठ मास के दशहरा में भगवान् विष्णु की इष्टि के विषय में अब आप श्रवण जिस विधि से नृप को सदा भगवान् विष्णु इष्टि करनी चाहिए । प्रतिवर्ष राजा को भगवान् हरि की सुवर्ण की प्रतिमा का निर्माण करना चाहिए अथवा किसी अन्य उत्तम धातु के द्वारा बनवाये या काष्ठ की अथवा शिलामयी प्रतिमा की रचना करानी चाहिए । शिल्पों के द्वारा उसका निर्माण करावे और मानोन्मानो से उसकी विधि के साथ प्रतिष्ठा करनी चाहिए । उसकी संस्थापना किसी देवालय में करावे या स्वयं द्वारा निर्मित देवालय में करे । पूर्व में वर्णित विधि से वासुदेव के बीच से सभी उपचारों के द्वारा भक्ति के द्वारा वासुदेव भगवान् का अभ्यर्चन करे । पूजा के अन्त में संस्कार किए हुए अग्नि में जो कि कुण्ड के मध्य में स्थित होवे फिर द्विज घृत से हरि भगवान् की प्रिय एक सहस्र आहुतियों से हवन करे । द्विज भली भाँति वासुदेव का पूजन करके फिर होम करे । नृप की अनुमति से उस प्रतिमा को मण्डल में ले जावे । प्रतिमा के दोनों कपोलों का दाहिने हाथ से स्पर्श करना चाहिए । उस प्रतिमा में हरिदेव की प्राण प्रतिष्ठा करे । हे नृप श्रेष्ठ! प्राणों की प्रतिष्ठा के करने पर भगवान विष्णु के प्राण नियत रूप से उस प्रतिमा में आ जाया करते हैं । प्राणों के समागत हो जाने पर इस प्रतिमा में नियत रूप से देवत्व हो जाया करता है । प्राणों की प्रतिष्ठा न करने पर प्रतिमाओं में जैसा पहले भाव होता है वैसे ही स्वर्ण आदि भाव

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित) · पृष्ठ 383, कुल 442 में से · BharatKosha