भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 442 में से

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पृष्ठ 384

बना रहता है और उनमें विष्णु का भाव नहीं होता है । हे पार्थिव! अन्य देवों की भी प्रतिमाओं में भी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए तभी उसमें देवत्व की सिद्धि हुआ करती हैं। प्राण स्थान के बिना सदा सुवर्ण-सुवर्ण ही रहता है, शिला-शिला है और काष्ठ केवल काष्ठ ही रहा करता है । सभी अपने ही स्वरूप में रहते हैं । वासुदेव के बीज से, 'मद्विष्णोः' इत्यादि से तथा अंग, अंगी मन्त्रों के द्वारा भगवान हरि की प्रतिष्ठा का समाचरण करना चाहिए । उसी भाँति मन्त्रों का ज्ञान रखने वाला हृदय में निरन्तर अंगुष्ठ को देखकर इन मन्त्रों के द्वारा प्रतिष्ठा करके हृदय में भी समाचरण करे । इसके लिए प्राण प्रतिष्ठा हों, इनके लिए प्राण क्षरण करें, यह देवत्व की संख्या के लिए स्वाहा, यह यजु का उच्चारण करें, वैदिक अंग मन्त्रों से और मन्त्रों से और इनके द्वारा सर्वत्र प्रतिमाओं में प्राणों की प्रतिष्ठा का समाचरण करना चाहिए । मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले पुरुष की प्रतिमा के पूजन में आत्मा में भी करना चाहिए । पूजा के भाग की विशुद्धि के लिए प्रथम प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए । इसमें प्राण प्रतिष्ठा का प्रतिमा के पूजन के बिना किसी भी बुध पुरुष को नहीं करना चाहिए । नृपश्रेष्ठ दशमी में इस भगवान विष्णु की इष्टि को करके उसके पूर्ण हो जाने पर ही फिर उस प्रतिमा को स्थापित करे । इस प्रकार से राजा दशहरा में हरि भगवान् की इष्टि को करके सभी मनोरथों की प्राप्ति कर लिया करता है और वह विघ्नों से भी रहित होता है । श्री पञ्चमी में भी देवी का कुन्द के पुष्पों के द्वारा उस समय में प्रकृष्ट रूप से पूजन करना चाहिए । गजराज पर संस्थित वासव का उत्तम उपहारों के द्वारा अर्चन करे । यहाँ पर पूजन में भी वासव का पहले कहे हुए लक्ष्मी के महातन्त्र का ग्रहण करना चाहिए और क्रम के अनुसार मण्डल आदि का भी ग्रहण करे । इस प्रकार से पूजन के करने पर और श्री पञ्चमी में विशेष रूप से किए जाने पर नृप श्री से समन्वित होता है और कभी भी श्री की हानि को नहीं प्राप्त किया करता है । हे पार्थिव! यह समाचार